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Friday, May 7, 2021

WHY NO ONE IS TALKING ABOUT INDO-BRITISH TRADE DEAL ?

 


Samuel Johnson famously said, “Patriotism is the last refuge of the scoundrel.” The two prime ministers in the photograph below would claim to be patriots both. The scoundrel part should be left to your judgment, but it is obvious that both of them cannot claim to be patriots at the same time.

These two prime ministers came up with a deal a couple of days ago that no one in India is talking about.  Even the Indian government, uncharacteristically, is not trumpeting about it. The UK government announced the day before yesterday that it sealed a deal with India in which Indians will make a one billion pound ($1.39 billion) investment in the UK creating 6500 British jobs. In addition India will open its market doors wider by reducing tariffs not only on British cars and British whisky but also on British apples and pears.

It looks curiouser than Alice’s Wonderland. India lost 7.25 million jobs in April alone. Actually Tens of millions of Indian jobs have been lost during the pandemic and during the Modi misrule. And Indian moneybags facilitated by the Modi government are going to invest more than Rs 10 thousand crores in the UK creating highly paid British jobs! On top of that India will also hurt the interests of Indian producers of apples and pears (also of cars and whiskeys) by lowering tariffs on British goods. What is India gaining out of it?

But if you think about it, it is not so surprising. This is a government that spends tens of thousands of crores on a new central vista, a new parliament and a new house for the Prime Minister at a time when thousands are dying due to shortage of oxygen and of hospital beds. This is also a regime under which its favourite corporate houses have registered fattest profits ever during the worst humanitarian crisis that India is groaning under.

This Prime Minister not only helps corporate houses to amass mountains of wealth in an India where people are losing jobs, facing unimaginable hardships – many are on the verge of starvation; where cremation pyres are spilling on to the roads and burning 24x7. He also helps them take that money to safe houses on foreign shores – invest in rich countries and create jobs there. Can he qualify to be a patriot, even if one ignores Samuel Johnson’s reference to being a scoundrel?

How anti-national this government and this Prime Minister can become? And why is this Indo-British deal not being talked about here in India?"


New Socialist Initiative 

Wednesday, December 30, 2020

मौजूदा किसान आन्दोलन पर वक्तव्य - रवि सिन्हा

 

'किसानों के पक्ष में लेखक- कलाकार'
29 दिसंबर 2020
ऑनलाइन सभा में प्रस्तुत वक्तव्य 

 



किसानों के इस आन्दोलन को उसके तात्कालिक उद्देश्यों और सम्भावनाओं मात्र के सन्दर्भ में देखें तो भी यह ऐतिहासिक है. अपनी अंतिम और सम्भावित सफलता से स्वतन्त्र इसकी उपलब्धियाँ अभी ही ऐतिहासिक महत्त्व की साबित हो चुकी हैं. लेकिन इस आन्दोलन के अर्थ और इसकी सम्भावनायें और भी बड़ी हैं. भारत की दुर्दशा के इस घोर अँधेरे में, जहाँ अधिनायकवादी फ़ासिस्ट शक्तियों के ख़िलाफ़ प्रतिरोध की सम्भावनााओं को एक के बाद एक कुचल दिया जाता रहा है, यह आन्दोलन एक मशाल बनकर सामने आया है. किसानों से शुरू होकर यह आन्दोलन सिर्फ़ किसानों का नहीं रह गया  है. पंजाब और हरियाणा के किसानों के द्वारा दिल्ली को घेरने से शुरू हुई यह मुहिम अब दिल्ली की सत्ता को घेरने वाली चौतरफ़ा मुहिम का रूप लेती जा रही है. हम किसानों के इस आन्दोलन को सर्वप्रथम इसलिए समर्थन देते हैं और उसमें इस लिये शामिल हैं कि उनकी माँगें जायज़ हैं और इस सरकार द्वारा ज़बरदस्ती लाये गये तीनों क़ानूनों को लेकर उनकी आशंकायें वास्तविक हैं. और हम इस आन्दोलन को इसलिये सलाम करते हैं और इससे प्रेरणा लेते हैं कि यह अँधेरे में रौशनी की मशाल बनकर सामने आया है. 

 अगर हम आंदोलन की तात्कालिक माँगों और उद्देश्यों की विस्तृत चर्चा यहाँ नहीं करते हैं तो इसका अर्थ यह नहीं कि इनके जायज़ और ऐतिहासिक महत्त्व के होने में हमें कोई संदेह है. अब यह जगज़ाहिर है कि ये तीनों क़ानून उस शैतानी योजना का हिस्सा हैं जिसके तहत कृषि क्षेत्र को कारपोरेट पूँजी के प्रत्यक्ष आधिपत्य में ले जाने की तैयारी है. यह न केवल किसानों की रही-सही आर्थिक सुरक्षा को समाप्त करेगा, सरकार को उसकी जिम्मेदारी से मुक्त करेगा और न्यूनतम समर्थन मूल्य तथा राज्य-संचालित मंडियों की व्यवस्था को तोड़ देगा, बल्कि यह पूरे देश की आम जनता की खाद्य-सुरक्षा - जितनी भी है और जैसी भी है - को ख़तरे में डाल देगा. साथ ही ये क़ानून भारत के संघीय ढाँचे के विरुद्ध भी हैंऔर केन्द्र द्वारा राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण हैं. यह सब आप सभी को मालूम है और इन कारणों से ही इस आंदोलन का सूत्रपात हुआ है. 

 लेकिन जैसा कि मैंने कहा, इस आन्दोलन का महत्त्व अधिक व्यापक और अधिक गहरा है. इसकी सम्भावनायें दूरगामी हैं. इसके राजनैतिक महत्त्व को और इसकी ऐतिहासिक भूमिका को समझा जाना चाहिये और समझाया जाना चाहिये. 

 आप ग़ौर करेंगे कि पूँजीवादी व्यवस्था के अधीन शासक वर्गों में आम तौर पर एक श्रम-विभाजन होता है. आर्थिक संसाधनों के निजी और संकेद्रित स्वामित्व तथा बाज़ार की व्यवस्था द्वारा समाज पर पूँजी का आर्थिक आधिपत्य सुनिश्चित किया जाता है, तो उसी समाज का राजनैतिक प्रबन्धन लोकतान्त्रिक प्रणाली के द्वारा किया जाता है. इस प्रणाली से शासक वर्गों को लोक-स्वीकार्यता हासिल होती है. इसकी कुछ कीमत उन्हें लोकतान्त्रिक अंकुश के रूप में चुकानी पड़ती है. शासक वर्गों की राजनीति का एक प्रमुख उद्देश्य यह होता है कि लोक-स्वीकार्यता और अंकुश के बीच ऐसा सन्तुलन स्थापित हो जिसमें लोक-स्वीकार्यता बढ़े और अंकुश न्यूनतम हो. आज से पचास साल पहले तक यह सन्तुलन कल्याणकारी राज्य की अवधारणा में प्रकट होता था. कम से कम उन्नत पूंजीवादी देशों में तो ऐसी ही हवा थी. इस संतुलन में आर्थिक मुद्दों और राजनैतिक एजेंडा के बीच बहुत बड़ा गैप नहीं होता था. 

 पिछले पचास सालों में दुनिया के पैमाने पर इस संतुलन में बदलाव आया है. आर्थिक मुद्दों को राजनीति के केन्द्र से विस्थापित करने का तरीक़ा निकाला गया है. इसके लिये राजनीति के केन्द्र में पहचान, परंपरा, धर्म, संस्कृति, मिथक, उन्मादी राष्ट्रवाद इत्यादि को स्थापित किया गया है. दुनिया भर में दक्षिणपंथ के उभार के पीछे यह प्रमुख कारण रहा है. पूँजीवादी व्यवस्था को अपने अन्तर्भूत कारणों से पिछले संतुलन में बदलाव की ज़रूरत थी. यह ज़रूरत इस नयी राजनीति ने पूरी की है. इसमें लोक-स्वीकार्यता आर्थिक मुद्दों से इतर कारणों द्वारा हासिल की जाती है. इससे अंकुश वाले पक्ष में भी कमी आती है. जो राजनैतिक शक्तियाँ नग्न रूप में कारपोरेट पूँजी के नौकर की भूमिका में होती हैं और जनता की संपत्ति को, उसके उत्पादन को और उसके आर्थिक-भौतिक जीवन को पूँजी और बाज़ार के हवाले करती जाती हैं उन्हीं को अर्थेतर और वर्गेतर कारणों से जनता का समर्थन भी हासिल होता है. 

 भारत में यह रणनीति हिन्दुत्व की राजनीति के ज़रिये लागू की गयी है. इसकी विडम्बना यह है कि जो जनता पिसती है वह उसी का समर्थन करती है जिसके द्वारा वह पीसी जाती है. यह तो ठीक है कि ऐसा समर्थन हासिल करने के लिये सटीक मौकों पर दंगे-फ़साद, राष्ट्रवादी उन्माद और सांप्रदायिक-सामुदायिक वैमनस्य का सहारा लिया जाता है. लेकिन प्रश्न तो फिर भी बना रहता है कि ये उपाय कारगर क्यों सिद्ध होते हैं. विडम्बना यह भी है कि जो राजनेता जनता के बीच से उभरने का दावा करते हैं, जिनका बचपन ग़रीबी में बीता होता है, जिनकी पैदाइश पिछड़े वर्गों में हुई होती है और जो चाय बेचकर जीविकोपार्जन की कथायें कह सकते हैं, उनके लिए यह तुलनात्मक रूप में आसान होता है कि वे निर्लज्ज रूप में पूँजी की चाकरी करें और आम जनता को नुक्सान पहुंचायें. कुल मिलाकर हमारे लिये यह सब एक कठिन चुनौती है. जो लोग यह सोचते हैं हम जनता के बीच जाकर आसानी से इन आसुरी और शैतानी शक्तियों का पर्दा-फ़ाश कर देंगे और जनता सच सुनते ही हमारे पक्ष में आ जायेगी, वे इस चुनौती को कम कर के आँक रहे हैं. 

 इस चुनौती के सामने रखिये तो मौजूदा किसान आन्दोलन का महत्त्व समझ में आता है. अनेक परिस्थितियों का सम्मिलन होता है तब ऐसे मौके सामने आते हैं जब शासक वर्गों के घटाटोप वर्चस्व को चुनौती दी जा सकती है. उस पर भी ऐसे मौकों को वाक़ई फलीभूत करने के लिये कुशल और समझदार नेतृत्व की ज़रूरत होती है. मौजूदा किसान आन्दोलन इन शर्तों पर अभी तक तो खरा उतरता दिखाई देता है. इसे हम सभी की भागीदारी की और ज़बरदस्त समर्थन की ज़रूरत है. ज़रूरत इस बात की भी है कि हम सब राजनैतिक परिदृश्य को और राजनैतिक उद्देश्यों को आँख से ओझल न होने दें.

 आन्दोलन के समक्ष चुनौतियाँ और सम्भावित ख़तरे भी मौजूद हैं. सरकार के द्वारा यह कोशिश लगातार बनी हुई है कि आन्दोलन को बदनाम किया जा सके और देश के पैमाने पर जनमत और लोकभावना को उसके विरुद्ध किया जा सके. यह ठीक है कि इस बार सरकार को अपनी साज़िशों में आसानी से सफलता नहीं मिलने वाली है. यह मसला किसानों का है और मेहनतकश लोगों के हर तबके का है. अतः आन्दोलन को आसानी से अलग-थलग नहीं किया जा सकता. ऊपर से किसान संगठनों के नेतृत्व की समझ-बूझ क़ाबिले-तारीफ़ है. लेकिन ऐसा नहीं है कि सरकार के तरकश में तीर बिलकुल नहीं बचे हैं. भले इस बार दंगे-फ़साद या राष्ट्रवादी उन्माद तत्काल कारगर न हो पायेंदूसरे उपाय ज़रूर आजमाए जा सकते हैं. मसलन आने वाले चुनावों की सरगर्मी का इस्तेमाल आन्दोलन पर से देश और दुनिया का ध्यान हटाने के लिए किया जा सकता है. 

 यह भी ग़ौरतलब है कि जन-आन्दोलन अपने राजनैतिक उद्देश्य हासिल करने में हमेशा कामयाब नहीं हो पाते. राजनैतिक कामयाबी के लिए आवश्यक होता है कि आन्दोलन राजनैतिक उद्देश्यों और निरन्तर बदलती परिस्थितियों के बारे में हमेशा सचेत रहे. दुनिया के पैमाने पर अरब स्प्रिंग जैसे अनेक विशाल जन-आन्दोलनों को हम विफल होते देख चुके हैं. वास्तविक मसलों पर खड़े हुए विशाल आन्दोलनों को भी थकाया जा सकता है, उनमें दरार डाली जा सकती है और उनसे जनता का ध्यान हटाया जा सकता है. यह भी भूलने की बात नहीं है कि जनता ने भयंकर अत्याचार, भ्रष्टाचार और कुव्यवस्था की सज़ा इस सरकार को देने से इनकार किया है. ताज़ा उदाहरण लॉक-डाउन के समय भयंकर त्रासदी झेलने वाले प्रवासी मज़दूरों का है जिन्होंने सारे संकट झेलने के बाद भी सत्तारूढ़ पार्टी को हाल के चुनावों में सज़ा नहीं दी या उस तरह से नहीं दी जैसी कि अपेक्षा थी. 

 आन्दोलन के बीचो-बीच होते हुए ये बातें इसलिए आवश्यक हैं कि इनसे आन्दोलन की सफलता-विफलता का प्रश्न जुड़ा हुआ है. पहली बात तो यह कि आन्दोलन राजनैतिक परिस्थितियों को और उनमें निहित ख़तरों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता. मसलन पश्चिम बंगाल के तथा अन्य राज्यों के आने वाले चुनाव न केवल आन्दोलन से जनता का ध्यान हटा सकते हैं बल्कि इन चुनावों में केंद्र में सत्तारूढ़ शक्तियों की जीत आन्दोलन को कमज़ोर करने में और अंततः उसे कुचलने में महती भूमिका निभा सकती है. अतः यह आवश्यक है कि आन्दोलन लम्बे समय तक डटा रहे और चुनावों पर भी वांछित प्रभाव डाले. अपने तात्कालिक हितों और उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए भी आन्दोलन को राजनैतिक तौर पर कुशल और सचेत होना पड़ेगा. इसके लिए यह भी आवश्यक है कि फ़ासीवाद और सम्प्रदायवाद की विरोधी जनपक्षधर शक्तियाँ भी किसान आंदोलन से सीख लें और राजनैतिक सूझ-बूझ का परिचय  दें.  

 अन्त में, बौद्धिक-सांस्कृतिक-सृजनशील लोगों का दायित्व हमेशा की तरह यहाँ भी विशेष बनता है. हमारी यह ज़िम्मेदारी बनती है कि हम इस आन्दोलन का, और व्यापक प्रतिरोध आन्दोलन का, उत्साह बढ़ायें, उसमें आशा का संचार करें, लेकिन साथ ही यथार्थ की यथार्थवादी समझ भी बनायें. ये दोनों उद्देश्य परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक दूसरे के पूरक हैं. आशा-उत्साह का संचार सच से आँख चुरा कर नहीं हो सकता और एक दूसरे को वही घिसी-पिटी तथाकथित उत्साहजनक बातें सुनाकर भी नहीं हो सकता जिन्हें हम एक दूसरे को हज़ार बार सूना चुके होते हैं. दूसरी तरफ़ सपनों को साकार करने वाली रणनीति के लिये भी यथार्थ की निर्मम यथार्थवादी समझ की आवश्यकता होती है. 

 मैं यह दुहराये बिना नहीं रह सकता कि यह आन्दोलन भारत के मौजूदा अँधेरे एक मशाल बनकर सामने आया है. मैं एक बार फिर इस गौरवशाली आन्दोलन को सलाम करता हूँ, इसे अपना समर्थन देता हूँ, और तात्कालिक एवं दूरगामी दोनों स्तरों पर इसकी सफलता की कामना करता हूँ. 

 


Sunday, December 6, 2020

किसान आंदोलन की माँगों और 8 तारीख के भारत बंद के समर्थन में जारी बयान

 


किसान आंदोलन की माँगों और तारीख के भारत बंद के समर्थन में न्यू सोशलिस्ट इनीशिएटिव, दलित लेखक संघ, अखिल भारतीय दलित लेखिका मंच, प्रगतिशील लेखक संघ, जन संस्कृति मंच, इप्टा, संगवारी, प्रतिरोध का सिनेमा और जनवादी लेखक संघ द्वारा जारी बयान )

 


image courtesy -Reuters

तीन जनद्रोही कृषि-क़ानूनों के खिलाफ़ किसानों के ऐतिहासिक आन्दोलन का साथ दें!

केन्द्र सरकार के कार्पोरेटपरस्त एजेण्डा के विरोध में अपनी आवाज़ बुलन्द करें!

8 दिसम्बर के भारत बंद को सफल बनाएं!

 भारत का किसान जिसके संघर्षों और कुर्बानियों का एक लम्बा इतिहास रहा है आज एक ऐतिहासिक मुक़ाम पर खड़ा है।

हज़ारों-लाखों की तादाद में उसके नुमाइन्दे राजधानी दिल्ली की विभिन्न सरहदों पर धरना दिए हुए हैं और उन तीन जनद्रोही क़ानूनों की वापसी की मांग कर रहे हैं जिनके ज़रिए इस हुकूमत ने एक तरह से उनकी तबाही और बरबादी के वॉरंट पर दस्तख़त किए हैं। अपनी आवाज़ को और बुलंद करने के लिए किसान संगठनों की तरफ़ से 8 दिसम्बर को भारत बंद का ऐलान किया गया है।

सरकार भले ही यह दावा करे कि ये तीनों क़ानून - जिन्हें महामारी के दिनों में पहले अध्यादेश के ज़रिए लागू किया गया था और फिर तमाम जनतांत्रिक परंपराओं को ताक़ पर रखते हुए संसद में पास किया गया - किसानों की भलाई के लिए हैं, लेकिन यह बात बहुत साफ़ हो चुकी है कि इनके ज़रिए राज्य द्वारा अनाज की खरीद की प्रणाली को समाप्त करने और इस तरह बड़े कॉर्पोरेट घरानों के लिए ठेका आधारित खेती करने तथा आवश्यक खाद्य सामग्री की बड़ी मात्रा में जमाखोरी करने की राह हमवार की जा रही है।

लोगों के सामने यह भी साफ़ है कि यह महज़ किसानों का सवाल नहीं बल्कि मेहनतकश अवाम के लिए अनाज की असुरक्षा का सवाल भी है। अकारण नहीं कि किसानों के इस अभूतपूर्व आन्दोलन के साथ खेतमज़दूरों, औद्योगिक मज़दूरों के संगठनों तथा नागरिक समाज के तमाम लोगों, संगठनों ने अपनी एकजुटता प्रदर्शित की है।

 जनतंत्र और संवाद हमेशा साथ चलते हैं। लेकिन आज यह दिख रहा है कि मौजूदा निज़ाम की ओर से जिस न्यू इंडियाके आगमन की बात की जा रही है, उसके तहत जनतंत्र के नाम पर अधिनायकवाद की स्थापना का खुला खेल चल रहा है।

आज की तारीख में सरकार किसान संगठनों के साथ वार्ता करने के लिए मजबूर हुई है, मगर इसे असंभव करने की हर मुमकिन कोशिश सरकार की तरफ़ से अब तक की जाती रही है। उन पर लाठियां बरसायी गयीं, उनके रास्ते में तमाम बाधाएं खड़ी की गयी, यहां तक कि सड़कें भी काटी गयीं। यह किसानों का अपना साहस और अपनी जीजीविषा ही थी कि उन्होंने इन कोशिशों को नाकाम किया और अपने शांतिपूर्ण संघर्ष के काफ़िलों को लेकर राजधानी की सरहदों तक पहुंच गए।

किसानों के इस आन्दोलन के प्रति मुख्यधारा के मीडिया का रवैया कम विवादास्पद नहीं रहा। न केवल उसने आन्दोलन के वाजिब मुद्दों को लेकर चुप्पी साधे रखी बल्कि सरकार तथा उसकी सहमना दक्षिणपंथी ताक़तों द्वारा आन्दोलन को बदनाम करने की तमाम कोशिशों का भी जम कर साथ दिया। आंदोलन को विरोधी राजनीतिक पार्टी द्वारा प्रायोजित बताया गया, किसानों को खालिस्तान समर्थक तक बताया गया।

दरअसल, विगत कुछ सालों यही सिलसिला आम हो चला है। हर वह आवाज़ जो सरकारी नीतियों का विरोध करती हो भले ही वह नागरिकता क़ानून हो, सांप्रदायिक दंगे हों, नोटबंदी हो उसे बदनाम करने और उसका विकृतिकरण करने की साज़िशें रची गयीं। किसानों का आंदोलन भी इससे अछूता नहीं है।

यह सकारात्मक है कि इन तमाम बाधाओं के बावजूद किसान शांतिपूर्ण संघर्ष की अपनी राह पर डटे हैं।

हम सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन किसानों के इस अभूतपूर्व आन्दोलन के प्रति अपनी एकजुटता प्रगट करते हैं। हम जनता तथा जनता के संगठनों, पार्टियों से अपील करते हैं कि वे इस आन्दोलन के साथ जुड़ें और 8 दिसम्बर के भारत बंद को सफल बनाकर केंद्र सरकार को एक स्पष्ट संदेश दें। 

हम सरकार से यह मांग करते हैं कि वह अपना अड़ियल रवैया छोड़े और तीन जनद्रोही कृषि-क़ानूनों को रद्द करने का ऐलान करे।

 हम आंदोलनरत किसानों से भी अपील करते हैं कि वे शांति के अपने रास्ते पर अडिग रहें।

जीत न्याय की होगी ! जीत सत्य की होगी !! जीत हमारी होगी !!

 

न्यू सोशलिस्ट इनीशिएटिव   दलित लेखक संघ   अखिल भारतीय दलित लेखिका मंच   प्रगतिशील लेखक संघ   जन संस्कृति मंच   इप्टा   संगवारी   प्रतिरोध का सिनेमा   जनवादी लेखक संघ


Tuesday, August 18, 2020

साझा बयान : बुद्धिजीवियों-मानवाधिकारकर्मियों को फ़र्ज़ी आरोपों के तहत फंसाये जाने के विरोध में


जन संस्कृति मंच, प्रगतिशील लेखक संघ, दलित लेखक संघ, प्रतिरोध का सिनेमा, इप्टा, संगवारीन्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव और जनवादी लेखक संघ ने प्रशांत भूषण को अदालत की अवमानना का दोषी क़रार दिए जाने तथा भीमा-कोरेगाँव और दिल्ली दंगों के मामलों में बुद्धिजीवियों-मानवाधिकारकर्मियों को फ़र्ज़ी आरोपों के तहत फंसाये जाने के विरोध में जारी साझा बयान

              

भारतीय लोकतंत्र का संकट लगातार गहराता जा रहा है. अभिव्यक्ति की आज़ादी और वाजिब माँगों के लिए चलने वाले संघर्ष का जैसा दमन मौजूदा निज़ाम में हो रहा है, उसकी मिसाल आज़ाद भारत के इतिहास में ढूँढे नहीं मिलेगी. सबसे ताज़ा उदाहरण स्वाधीनता दिवस की पूर्व संध्या पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रशांत भूषण को अदालत की अवमानना का दोषी ठहराया जाना है. यह विचारणीय है कि फ़ैसले में उन्हें भारतीय लोकतंत्र के जिस महत्त्वपूर्ण स्तम्भ की बुनियाद को अस्थिरकरने के प्रयास का दोषी पाया गया है, उसकी अस्थिरता के मायने क्या हैं और उसके वास्तविक कारक कौन-से हैं/हो सकते हैं! पर यह जितना भी विचारणीय हो, सवाल है कि क्या आप विचार कर भी सकते हैं? इस तरह के विचार-विमर्श की गुंजाइश/स्वतंत्रता/अधिकार को बहुत क्षीण किया जा चुका है और ऐसा जान पड़ता है कि जिनके ऊपर रीज़नेबल रेस्ट्रिक्शन्सके दायरे में अभिव्यक्ति की आज़ादी को सुनिश्चित करने का दारोमदार है, वे खुद आगे बढ़कर उस आज़ादी का दमन कर रहे हैं. पिछले कुछ समय में दो घटनाओं को बहाना बनाकर सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्त्ताओं, मानवाधिकार-कर्मियों और लेखकों-बुद्धिजीवियों की गिरफ़्तारी, या तफ़्तीश के नाम पर उत्पीड़न के सिलसिले ने जो गति पकड़ी है, वह बेहद चिंताजनक है. भीमा-कोरेगाँव मामले और उत्तर-पूर्वी दिल्ली के दंगों के असली अपराधी बेख़ौफ़ घूम रहे हैं जबकि इन्हीं मामलों में फ़र्जी तरीक़े से बड़ी संख्या में सामाजिक कार्यकर्त्ताओं और बुद्धिजीवियों को गिरफ़्तार किया जा चुका है. केंद्र के मातहत काम करने वाली राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) और दिल्ली पुलिस इन मामलों में पूरी बेशर्मी से अपनी पक्षधर भूमिका निभा रही हैं. ऐसा लगता है कि नियंत्रण एवं संतुलन के सारे लोकतांत्रिक सरंजाम ध्वस्त हो चुके हैं.

 इधर बीबीसी और कारवाँ पर छपी कई रपटों ने यह साबित कर दिया है कि भीमा-कोरेगाँव और दिल्ली दंगों की जांच न केवल पक्षपातपूर्ण तरीक़े से चल रही है, बल्कि असली अपराधियों को बचाने और सरकारी नीतियों के आलोचक कर्मकर्त्ताओं को फँसाने के लिए निहायत फ़र्ज़ी कहानियाँ भी बनाई जा रही हैं. जैसे, बकौल बीबीसी, दिल्ली पुलिस की बनाई एक कहानी यह कहती है कि दिल्ली दंगों के साज़िशकर्त्ता उमर ख़ालिद, ताहिर हुसैन और ख़ालिद सैफ़ी ने 8 जनवरी को ही तय कर लिया था कि अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प के भारत आगमन के समय दिल्ली में दंगे कराये जाएँगे, जबकि ट्रम्प की यात्रा की ख़बर ही सबसे पहले 14 जनवरी को सामने आई थी!

 बीते तीन हफ़्तों में ही दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. हैनी बाबू की गिरफ़्तारी और प्रो. अपूर्वानंद (हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय), प्रो. पी के विजयन (अंग्रेजी विभाग, हिन्दू कॉलेज) और प्रो. राकेश रंजन (अर्थशास्त्र, श्रीराम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स) से हुई पूछताछ, जिसमें उन्हें संजीदा मामलों में फँसाने के बहुत मज़बूत इशारे और इरादे पढ़े जा सकते हैं, एनआईए और दिल्ली पुलिस के पक्षपातपूर्ण रवैये के ताज़ातरीन उदाहरण हैं.

 अल्पसंख्यकों और दलितों का अनवरत जारी दमन-उत्पीड़न, जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 का असंवैधानिक और जबरिया ख़ात्मा, सीएए और देशव्यापी एनआरसी लाने की कोशिश, पूरे देश पर एकरूपता थोपने की हिन्दुत्ववादी मुहिम, किसानों-मज़दूरों और पूरी मेहनतकश जनता के लिए लगातार बदतर हालत पैदा करने वाली नीतियाँ, और इन सबके ख़िलाफ़ आलोचनात्मक सोच व्यक्त करने वाले चिंतकों-कलाकारों-कार्यकर्त्ताओं का चौतरफ़ा दमन--यह हमारे दौर की पहचान बन गयी है. हम मौजूदा निज़ाम द्वारा पैदा किये गए इन हालात की निंदा करते हैं और यह कहना चाहते हैं कि इस चौहत्तरवें स्वाधीनता दिवस पर हम अपने देश की आज़ादी का यह हश्र होता देख, जश्न के तमाम सरकारी शोर-शराबों के बीच, अज़हद नाख़ुश हैं.

 हम सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन एकजुट होकर भीमा-कोरेगाँव और दिल्ली दंगों के नाम पर गिरफ़्तार किये गए सभी लेखकों, कलाकारों, पत्रकारों और मानवाधिकार-कर्मियों की रिहाई की माँग करते हैं. हम प्रो. अपूर्वानंद, प्रो. पी के विजयन और प्रो. राकेश रंजन को इन मामलों में फँसाने की कोशिशों की निंदा करते हैं. हम प्रशांत भूषण के बारे में आला अदालत के फ़ैसले को न्यायसंगत मानने से इनकार करते हैं और इस सम्बन्ध में आये अनेक क़ानून-विशेषज्ञों की इस राय से अपना इत्तेफाक़ ज़ाहिर करते हैं कि यह फ़ैसला सबसे मूल्यवान मौलिक अधिकार--अभिव्यक्ति के अधिकार--की पूरी तरह से अनदेखी करता है.

 

जन संस्कृति मंच | प्रगतिशील लेखक संघ | दलित लेखक संघ | प्रतिरोध का सिनेमा | संगवारी | इप्टा न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव | जनवादी लेखक संघ

Wednesday, July 15, 2020

साझा बयान : वरवर राव को रिहा करो



भीमा कोरेगाँव मामले तथा अन्य सभी मामलों में विचाराधीन लेखकों-मानवाधिकारकर्मियों को रिहा करो !

(न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव, जन संस्कृति मंच, दलित लेखक संघ, प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, जन नाट्य मंच, इप्टा, प्रतिरोध का सिनेमा और संगवारी की ओर से जारी साझा  बयान )



‘...कब डरता है दुश्मन कवि से ?
जब कवि के गीत अस्त्र बन जाते हैं
वह कै़द कर लेता है कवि को ।
फाँसी पर चढ़ाता है
फाँसी के तख़्ते के एक ओर होती है सरकार
दूसरी ओर अमरता
कवि जीता है अपने गीतों में
और गीत जीता है जनता के हृदयों में।’

(वरवर राव, बेंजामिन मोलेस की याद में, 1985)

देश और दुनिया भर में उठी आवाज़ों के बाद अन्ततः 80 वर्षीय कवि वरवर राव को मुंबई के जे जे अस्पताल में शिफ्ट कर दिया गया है। राज्य की असंवेदनशीलता और निर्दयता का इससे बड़ा सबूत क्या होगा कि जिस काम को क़ैदियों के अधिकारों का सम्मान करते हुए राज्य द्वारा खुद ही अंजाम दिया जाना था, उसके लिए लोगों, समूहों को आवाज़ उठानी पड़ी।

विगत 60 साल से अधिक वक़्त से रचनाशील रहे वरवर राव तेलुगू के मशहूर कवियों में शुमार किए जाते हैं। उनके 15 कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, जिनमें से अनेक का तमाम भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है। साहित्यिक आलोचना पर लिखी उनकी छह किताबों के अलावा उनके रचनासंसार में और भी बहुत कुछ है।

मालूम हो कि उनके गिरते स्वास्थ्य को देखते हुए उन्हें जमानत पर रिहा करने तथा बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने की माँग को लेकर अग्रणी अकादमिशियनों - प्रोफेसर रोमिला थापर, प्रोफेसर प्रभात पटनायक आदि ने महाराष्ट्र सरकार तथा एनआईए को अपील भेजी थी। उसका लब्बोलुआब यही था कि विगत 22 माह से वे विचाराधीन क़ैदी की तरह जेल में बन्द हैं, और इस अन्तराल में बिल्कुल स्वेच्छा से उन्होंने जाँच प्रक्रिया में पूरा सहयोग दिया है, ऐसी हालत में जब उनका स्वास्थ्य गिर रहा है तो उन्हें कारावास में बन्दी बनाए रखने के पीछे कोई क़ानूनी वजह नहीं दिखती (‘there is no reason in law or conscience)
प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि दुनिया का सबसे बड़ा जनतंत्र होने का दावा करनेवाले मुल्क में क्या किसी विचाराधीन क़ैदी को इस तरह जानबूझ कर चिकित्सा सुविधाओं से महरूम किया जा सकता है और क्या यह एक क़िस्म का एनकाउंटर नहीं होगा - जैसा सिलसिला राज्य की संस्थाएँ खुल्लमखुल्ला चलाती हैं

विडम्बना ही है कि भीमा कोरेगाँव मामले में बन्द ग्यारह लोग - जिनमें से अधिकतर 60 साल के अधिक उम्र के हैं और किसी न किसी स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे हैं - उन सभी के साथ यही सिलसिला जारी है।

 पिछले माह ख़बर आयी थी कि जानेमाने मानवाधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा को अचानक अस्पताल में भरती करना पड़ा था। प्रख्यात समाजवैज्ञानिक, अम्बेडकर वांग्मय के विद्वान् और तीस से अधिक किताबों के लेखक प्रोफेसर आनंद तेलतुम्बड़े - जो पहले से साँस की बीमारी का इलाज करवा रहे थे - उन्हें जहाँ अस्थायी तौर पर रखा गया था, वहाँ तैनात एनआईए-कर्मी खुद कोरोना पॉजिटिव निकला था। किस तरह क़ैदियों से भरे बैरक और बुनियादी स्वच्छता की कमी से जेल में तरह तरह की बीमारियाँ फैलने का ख़तरा बढ़ जाता है, इस पर रौशनी डालते हुए कोयल, जो सेवानिवृत्त प्रोफेसर शोमा सेन की बेटी है, ने भी अपनी माँ के हवाले से ऐसी ही बातें साझा कीं थी: ‘‘आख़िरी बार जब मैंने अपनी माँ से बात की, उसने मुझे बताया कि न तो उन्हें मास्क, न ही कोई अन्य सुरक्षात्मक उपकरण दिया जा रहा है। वह तीस अन्य लोगों के साथ एक ही सेल में रहती है और वे सभी किसी तरह टेढ़े-मेढ़े सो पाते हैं।’’

तलोजा जेल में बन्द भीमा कोरेगाँव मामले के नौ कैदी या भायकुला जेल में बन्द दो महिला कैदियों के बहाने - जो देश के अग्रणी विद्वानों, वकीलों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं में शुमार किए जाते हैं - अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि कितना कुछ अन्याय हमारे इर्दगिर्द पसरा होता है और हम पहचान भी नहीं पाते।

उधर असम से ख़बर आयी है कि विगत आठ माह से जेल में बन्द कृषक श्रमिक संग्राम समिति के जुझारू नेता अखिल गोगोई और उनके दो अनन्य सहयोगी बिट्टू सोनोवाल और धरज्या कोंवर, तीनों टेस्ट में कोविड पोजिटिव पाए गए हैं। 

गोरखपुर के जनप्रिय डॉक्टर कफ़ील खान जो विगत पाँच महीने से अधिक वक्त़ से मथुरा जेल में बन्द हैं तथा जिन पर सीएए विरोधी आन्दोलन में भाषण देने के मामले में गंभीर धाराएँ लगा दी गयी हैं, उनके नाम से एक विडियो भी जारी हुआ है जिसमें वे बताते हैं कि जेल के अन्दर हालात कितने ख़राब हैं और कोविड संक्रमण के चलते अनिवार्य ठहराए गए तमाम निर्देशों को कैसे धता बताया जा रहा है।

 तय बात है कि जहाँ तक स्वास्थ्य के लिए ख़तरों का सवाल है, हम किसी को अलग करके नहीं देख सकते हैं।

हर कोई जिसे वहाँ रखा गया है - भले ही वह विचाराधीन कैदी हो या दोषसिद्ध व्यक्ति - उसकी स्वास्थ्य की कोई भी समस्या आती है, तो उसका इन्तज़ाम करना जेल प्रशासन का प्रथम कर्तव्य बन जाता है। कोविड 19 के भयानक संक्रामक वायरस से संक्रमण का ख़तरा जब मौजूद हो और अगर इनमें से किसी की तबीयत ज्यादा ख़राब हो जाती है तो यह स्थिति उस व्यक्ति के लिए अतिरिक्त सज़ा साबित हो सकती है।

यह सवाल उठना लाज़िमी है कि जेलों में क्षमता से अधिक संख्या में बन्द क़ैदी, स्वास्थ्य सेवाओं की पहले से लचर व्यवस्था और कोविड संक्रमण का बढ़ता ख़तरा, इस स्थिति को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मार्च माह में दिए गए आदेश पर गंभीरता से अमल क्यों नहीं शुरू हो सका है? याद रहे कि जब कोविड महामारी फैलने लगी थी और इस बीमारी के बेहद संक्रामक होने की बात स्थापित हो चुकी थी, तब आला अदालत ने हस्तक्षेप करके आदेश दिया था कि इस महामारी के दौरान जेलों में बन्द क़ैदियों को पैरोल पर रिहा किया जाए ताकि जेलों के अन्दर संक्रमण फैलने से रोका जा सके। सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात को स्पष्ट किया था कि ऐसे कैदियों को पैरोल दी जा सकती है जिन्हें सात साल तक की सज़ा हुई है, या वे ऐसे मामलों में बन्द हैं जहाँ अधिकतम सज़ा सात साल हो।

ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश को कागज़ी बाघ में तब्दील कर दिया गया है। दिल्ली की जेल में एक सज़ायाफ़्ता क़ैदी की कोविड से मौत हो चुकी है। क्या सरकारें अपनी शीतनिद्रा से जगेंगी और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की रौशनी में जेलों के अन्दर बढ़ती भीड़ की गंभीर समस्या को सम्बोधित करने के लिए क़दम उठाएँगी?

कवि वरवर राव के बद से बदतर होते स्वास्थ्य के चलते एक बार नए सिरे से लोगों का ध्यान जेल के अन्दर विकट होती जा रही स्थिति और कोविड 19 के चलते उत्पन्न स्वास्थ्य के लिए ख़तरे की तरफ गया है और मानवाधिकारों के बढ़ते हनन की तरफ गया है। हमें इस ख़तरे से चेत जाने की ज़रूरत है।

 कोविड 19 के बहाने हर तरह के विरोध के दमन का जो सिलसिला सरकार ने तेज़ किया है, उसी का प्रतिबिम्बन पुलिस की इस कार्रवाई में भी दिखता है कि वह जमानत का आदेश मिलने के बावजूद क़ैदियों को रिहा नहीं करती और तीन चार दिन के अन्तराल में कुछ नयी ख़तरनाक धाराएँ लगा कर उन्हें जेल में ही बन्द रखती है। फिलवक्त़ मानस कोंवर, जो कृषक मुक्ति संग्राम समिति की छात्रा शाखा के अध्यक्ष हैं, का मामला सुर्खियों में है - उन्हें एनआईए अदालत ने जमानत दी है मगर जेल अधिकारियों ने बहाना बना कर रिहा नहीं किया है।

 हमें नहीं भूलना चाहिए कि जिन ख़तरनाक धाराओं में भीमा कोरेगाँव, उत्तर पूर्वी दिल्ली दंगे, कृषक मुक्ति संग्राम समिति आदि मामले में कार्रवाई की गयी है और लोगों को जेल में ठूँसा गया है, उन ख़तरनाक क़ानूनों का हश्र यही होता है कि 99 फ़ीसदी मामलों में लोग बेदाग छूट जाते हैं।

तो फिर, क्या इन्हें लागू करने का मक़सद महज प्रक्रिया को सज़ा में रूपांतरित करना है?

देश भर में सक्रिय हम सामाजिक-राजनीतिक और सांस्कृतिक संगठन यह माँग करते हैं कि 

1. वरवर राव को तत्काल बिना शर्त रिहा किया जाए।

2. ‘बेल नियम है और जेल अपवाद’ - इस समझ के साथ, भिन्न-भिन्न मामलों में बिना अपराध साबित हुए जेल की सज़ा काट रहे बुद्धिजीवियों, लेखकों और मानवाधिकार-कर्मियों को जमानत दी जाए