Tuesday, July 26, 2016

[वक्तव्य] गोरक्षा का आतंक


क्या केसरिया पलटन गाय के नाम पर फैलायी जा रही संगठित हिंसा से कभी तौबा कर सकेगी

(न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव द्वारा जारी वक्तव्य )

(For English Version, see the Link HERE )

गोरक्षा के नाम पर स्वयंभू हथियारबन्द गिरोहों की अत्यधिक सक्रियता, जिसमें जबरदस्त तेजी भाजपा के केन्द्र में सत्तासीन होने के बाद आयी है, उसे एक मुंहतोड़ जवाब पिछले दिनों गुजरात में मिला। जिस बेरहमी से शिवसेना से सम्बद्ध एक गोरक्षक दल ने  उना में दलितों के समूह पर हमला किया, (11 जुलाई 2016) जो मरी हुई गाय की खाल उतार रहे थे, उन्हें सार्वजनिक तौर पर पीटा और गोहत्या का आरोप लगा कर उन्हें पुलिस स्टेशन तक ले गए और इस समूची घटना का विडिओ बना कर सोशल मीडिया पर भी डाला ताकि और आतंक फैलाया जा सके, उस घटना ने जबरदस्त गुस्से को जन्म दिया है।

हजारों हजार दलित सूबे के अलग अलग हिस्सों में सड़कों पर उतरे हैं, उन्होंने सरकारी दफ्तरों का घेराव किया है, सरकारी सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाया है, पूरे राज्य स्तर पर बन्द का आयोजन किया है और सरकार को झुकाने की कोशिश की है। उन्होंने दोषियों को सख्त सज़ा देने की सरकार से मांग की है और साथ ही साथ उन पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है, जिन्होंने दलितों की शिकायत की अनदेखी की, जब उन्हें प्रताडित किया जा रहा था।
प्रतिरोध कार्रवाइयों का सिलसिला अभी थमा नहीं है। दलित अभी भी गुस्से में हैं। विरोध रैलियांे का अभी भी आयोजन हो रहा है।

उना में दलित अत्याचार की घटना का विरोध करते हुए लगभग तीस दलित युवकों ने एक सप्ताह के अन्दर आत्महत्या करने की कोशिश की है। अलग अलग राजनीतिक दलों के लोगों ने दलितों से अपील की है कि वह ऐसे कदम को न उठाएं और शान्तिपूर्ण तरीके से संघर्ष जारी रखें। निस्सन्देह, उना की घटना और उसके बाद नज़र आए दलित आक्रोश ने एक तरह से दलित आन्दोलन के एक नए मुक़ाम का आगाज़ किया है क्योंकि दलितों को यह बात अन्ततः समझ में आयी है कि हिन्दुत्व की सियासत किसी भी मायने में दलितों की हितैषी नहीं है और वह शुद्धता और प्रदूषण पर आधारित जाति व्यवस्था को अधिक मजबूत करती है। हिन्दुत्व की राजनीति के साथ दलितों का बढ़ता मोहभंग उस घटना में भी उजागर हुआ जब विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला मोदी के गृहनगर वाडनगर में पहुंचा जहां हजारों दलितों ने उग्र प्रदर्शन में हिस्सा लिया और दलितों पर अमानवीय अत्याचार के लिए प्रधानमंत्राी मोदी और भाजपा को सीधे जिम्मेदार ठहराया। इस घटना के विडिओ दिखाते हैं कि प्रदर्शन में शामिल दलित हाय रे मोदी .... हाय हाय रे मोदी का नारा लगा रहे थे - यह उस नारे का संशोधित रूप था जिसे महिलाएं हिन्दुओं के अंतिम संस्कार के प्रदर्शन में लगाती हैं। दलितों के इस गुस्से ने अस्सी के दशक की शुरूआत में दलितों की पुरानी पीढ़ी के लोगों द्वारा किए गए लड़ाकू प्रदर्शनों की याद ताज़ा कर दी जब वे आरक्षण की नीति की हिमायत में सड़कों पर उतरे थे और उन्होंने हिन्दुत्ववादी संगठनों का सीधे मुकाबला किया था।

यह समूची उथलपुथल आम दलितों के लिए भी - जिनकी आबादी लगभग आठ फीसदी तक है और जो लम्बे समय से हिन्दुत्ववादी संगठनों के नफरत एवं असमावेश के प्रोजेक्ट में लगभग समाहित थे - सीखने का अनुभव रहा है। प्रदर्शनकारियों द्वारा अपनाए गए संघर्ष के एक रूप ने सत्ताधारी तबके को काफी बेचैन किया है और जिस रूप के राष्ट्रीय स्तर पर फैलाव की सम्भावना बनती है। इसके तहत उन्होंने मरी हुई गायों को लाकर सरकारी दफ्तरों  जानेमाने नेताओं के घरों के सामने फेंका है, जिन्हें वहां से हटाना भी प्रशासन के लिए टेढ़ी खीर साबित हुआ है। दलितों के अच्छे खासे हिस्से ने मरी हुई गायों को उठाना भी बन्द कर दिया है और यह ऐलान भी कर दिया है कि अब वह भले ही भूख से मर जाएं मगर इस पेशे को कभी नहीं अपनाएंगे। दरअसल, इस कदम से दलितों ने मनुवादी/ब्राहमणवादी ताकतों को एक चेतावनी दी है कि जिस दिन वह उन गन्देकामों को करना बन्द कर देंगे, जिसके लिए उन्हें लांछन लगाया जाता है, वर्ण समाज के लिए प्रलय जैसी स्थिति पैदा होगी। संघर्ष के इस रूप की अगुआई कर रहे एक कार्यकर्ता ने एक पत्रकार से बात करते हुए कहा कि उन्होंने यह कदम इसलिए उठाया है ताकि स्वयंभू गोभक्तों को सबक सीखाया जा सकेः गोरक्षक हम पर हमला करते हैं क्योंकि वह समझते हैं कि गाय उनकी माता है, ठीक है, अब उन्हें चाहिए कि अपनी माता की सेवा करे औरजब वह मरे तो उसकी लाश को उठाएं’ (

मीडिया के अलग अलग हिस्सों में प्रकाशित फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्टें बताती हैं कि किस तरह पुलिस ने इन अत्याचारियों को रास्ते में नहीं रोका और मामूली प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखवाने के लिए घंटों बरबाद किए। ऐसी अपुष्ट ख़बरें भी मिली हैं कि स्थानीय पुलिस ने गोरक्षक दल को खुद सूचित किया था कि मरी हुई गाय की खाल उतारी जा रही है। समूचे मामले में स्थानीय पुलिस की संलिप्तता एवं सांठगांठ इस बात से भी उजागर होती है कि विडिओ के रूप में समूची घटना के प्रमाण मौजूद होने के बावजूद - जो उजागर करते हैं कि दलितों पर सार्वजनिक अत्याचार की इस घटना में तीस से अधिक लोग शामिल थे - उसने सिर्फ आठ लोगों को गिरफतार किया है और यह प्रमाणित करने में लगी है कि यह अपवादात्मक घटना है।

दलितों के बढ़ते आक्रोश ने, जिस दौरान राज्य सरकार गोया शीतनिद्रा में रही, उसने ऐसी तमाम अन्य घटनाओं को उजागर किया है जब गोरक्षकों ने दलितों पर हमले किए थे और पुलिस ने पीड़ितों की शिकायत लेने में भी नानुकुर की थी। इस घटना ने दलितों के रोजमर्रा के अपमान एंव भेदभाव, सामाजिक जीवन में मौजूद व्यापक अलगाव एवं अस्प्रश्यता, बुनियादी मानवाधिकार से उन्हें किया जा रहा इन्कार और हाल के वक्त़ में अत्याचारों की घटनाओं में हुई जबरदस्त बढ़ोत्तरी की परिघटना को नए सिरेसे रेखांकित किया है और इस बात को भी दर्शाया है कि किस तरह इस बढ़ते आतंक को रोकने के लिए अधिक सक्रिय कदम उठाने के मामले में सत्ताधारी जमातें असफल रही हैं।

गोरक्षकों की आपराधिक कार्रवाइयां और दंडमुक्ति के जिस बोध के साथ वह कानून को अपने हाथ में लेते दिख रहे हैं - जो मामला राष्टीय सूर्खियों में आया है - वह एक ऐसा अवसर भी रहा है कि प्रशासन में उच्च पद पर बैठे अधिकारीगण इस आतंक के बारे में खुल कर बोलते दिख रहे हैं। पिछले दिनों सूबा गुजरात के मुख्य सचिव जी आर ग्लोरिया ने एक राष्टीय स्तर के अख़बार को बताया ’...यह स्वयंभू गोरक्षक दरअसल वाकई में अपराधीतत्व हैं। उनके मुताबिक गुजरात में गाय के नाम पर दो सौ से अधिक ऐसे हथियारबन्द समूह बने हैं, जो अपने आक्रामक व्यवहार और जिस तरह वह कानून को अपने हाथ में लेते हैंउस वजह से कानून और व्यवस्था के लिए चुनौती बने हैं और सरकार उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करनेवाली है। मुख्य सचिव ने इस बात की भी ताईद की कि पुलिस विभाग में नीचले पदों पर तैनात लोग इन हथियारबन्द गिरोहों के साथ सांठगांठ रखते हैं। 

इस बात को रेखांकित किया जाना चाहिए कि कुछ वक्त़ पहले पंजाब-हरियाणा उच्च अदालत ने भी एक अन्य गोरक्षा दल के हाथों कुरूक्षेत्र में एक ट्रांसपोरटर मुस्तैन की हत्या की सीबीआई जांच का आदेश देते हुए /मार्च 2016/ गोरक्षकोंके बढ़ते अपराधीकरण का विशेष उल्लेख किया था, जो दंडमुक्ति के भय से काम करते हैं। अदालत का कहना था कि कथित गोरक्षक समूह, जो राजनेताओं और राज्य के संचालन में मुब्तिला वरिष्ठ कर्मियों की शह पर बने हैं, जिनमें पुलिसवाले संलग्न हैं
‘‘वह कानून को तोड़ने पर आमादा रहते हैं और अपने निजी फायदे या अन्य कारण के लिए जानवर ढोनेवाले गरीब लोगों का दोहन करते हैं। .. उपरी तौर पर देखें तो पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी भी इन गोरक्षा समूहों के साथ मिले दिखते हैं। 

Image: http://www.gaurakshadalharyana.org/


दलितों का जो गुस्सा गुजरात की सड़को पर दिखाई दिया - जिसे विश्लेषकों के एक हिस्से ने दलित विद्रोह के तौर पर भी सम्बोधित किया - उसका देश के बाकी हिस्सों में भी असर हुआ है और उसने समूचे संसदीय विपक्ष को अपनी एकजुटता कायम करने का मौका दिया है जिसने यह मांग की है कि ऐसे गोरक्षा समूहों पर तत्काल पाबंदी लगनी चाहिए और ऐसे तमाम असामाजिक तत्व जो इसके नाम पर फल-फूल रहे हैं, उन पर अंकुश लगना चाहिए। संसद के पटल पर ऐसे हथियारबन्द गिरोहों की भर्त्सना हुई है, जो मुसलमानों के साथ साथ दलितों को भी निशाना बना रहे हैं, जो उनके साथ मारपीट कर रहे हैं और कभी उनको जान से भी खतम कर रहे हैं। सांसदों ने इस बात को भी कहा कि किस तरह मौजूदा सत्ताधारियों की नीतियां और कार्यक्रमों ने ऐसे समूहों को अवसर प्रदान किया है और क्यों नहीं इन समूहों पर पाबन्दी लगायी जाती।

दरअसल जिस तरह गाय को राजनीति के केन्द्र में लाया जा रहा है, जहां महज यह अफवाह कि उसकी कहीं हत्या हो रही है आततायी तत्वों को गोया कानून अपने हाथ में लेने की छूट देती हैं, जहां पुलिस एवं प्रशासन के लोग भी शामिल रहते हैं, इस समूची परिघटना की तुलना पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के ईशनिंदा के अपराधसे की जा रही है। इसके तहत पाकिस्तान में कई बेशकीमती लोग मार दिए गए हैं और तमाम लोग आज भी जेल में सड़ रहे हैं क्योंकि पाकिस्तान सरकार उन धार्मिक अतिवादियांें पर अंकुश लगाने में विफल हुई है जिनके लिए ईशनिन्दा के नाम पर बना कानून मासूमों को प्रताडित करने का जरिया बना है। यह चिन्ता भी प्रगट की जा रही है कि क्या भारत भी पाकिस्तानके रास्ते चलेगा - जहां वह राजनीति में सेक्युलर सिद्धान्तों का छीजन नहीं रोक पा रहा है और सामाजिक-राजनीतिक जीवन में आस्था के लिए अधिक वैधता सुगम कर रहा है।

बिहार के पूर्वमुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव द्वारा उनाघटना के मददेनज़र प्रधानमंत्री मोदी को लिखा खुला पत्र देश के मौजूदा माहौल को ठीक से प्रस्तुत करता है जहां वह साफ लिखते हैं कि '..यह जो गौ-सेवा और गौ रक्षा के नाम पर कुकुरमुत्तों की तरह जगह-जगह हिंसक तथाकथित गौ-रक्षक दल इत्यादि पनप रहे हैं, इस आग के पीछे सबसे बड़ा हाथ आरएसएस और आपका ही है.

पहले लोकसभा चुनाव और हाल ही में हुए बिहार विधानसभा चुनावों में जिस गैर जिम्मेदारी से पिंक रिवोल्यूशन, गौ मांस, गाय पालने वाले और गाय खाने वाले आदि गैर जरूरी बातों पर समाज तोड़ने वाले भड़काऊ भाषण दिए गये थे, उन्हीं का यह असर है कि आज किसान खरीद कर गायों को गाड़ी में लादकर ले जाने से भी डरता है. जाने रास्ते में कौन उन्हें गौ रक्षा के नाम पर घेर कर पीट दे या जान ही ले ले.

आपने तो लोगों को बांटकर, जहर रोपकर वोटों की खूब खेती की और जो चाहते थे वो बन गए. पर आपका बोया जहर रह-रह जातिवादी और सांप्रदायिक सांप का रूप धर, समय-समय पर उन्मादी फन उठाता है और देश की शांति और सौहार्द को डस कर चला जाता है. मुझे अत्यंत दुःख है कि मुझे अपने देश के प्रधानमन्त्री को यह बताना पड़ रहा है कि यह आग आपकी ही लगाई हुई है. इस आग में भस्म होकर जो गौपालक, किसान बन्धु, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक मर रहे हैं, उसके दोषी सिर्फ आप, आपकी पार्टी और आपकी असहिष्णु विचारधारा की जननी संघ है. 

भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ - जो अब उना की घटना के बाद राजनीतिक नुकसान का आकलन करने में लगे हैं और उसके चुनावी प्रभावों का आकलन कर रहे हैं, इसी दौरान भाजपा के एक वरिष्ठ नेता द्वारा बहुजन समाज पार्टी की नेत्राी सुश्री मायावती - जो उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्राी रह चुकी हैं - को निशाना बना कर की गई नारीद्रोही टिप्पणियों ने गोया आग में घी का काम किया है। यह अलग बात है कि इन टिप्पणियों को लेकर संसद के पटल पर भाजपा के वरिष्ठ नेताओं द्वारा खेदप्रगट किए जाने की बात भी एक किस्म का छलावा साबित हुई है क्योंकि  बसपा के एक अन्य नेता द्वारा की गयी वैसी ही विवादास्पद टिप्पणियों का इस्तेमाल करते हुए वह जमीनी स्तर पर वह आक्रामक रवैया अख्तियार करते दिख रहे हैं।

पड़ोसी राज्य महाराष्ट जहां सत्तासीन भाजपा-शिवसेना की सरकार द्वारा अम्बेडकर भवन को गिराये जाने की घटना - जिस कदम को लेकर जैसे विरोध उग्र हो रहा है वैसे महाराष्ट सरकार उसे लेकर खेद प्रगट करने को मजबूर हुई है - से उठे उद्वेलन की बातें अब चल ही रही हैं या हैद्राबाद सेंट्रल युनिवर्सिटी में रिसर्च स्कॉलर रोहिथ वेमुल्ला की संस्थागत हत्याऔर उस समूचे प्रसंग मंे कुछ केन्द्रीय मंत्रियों की विवादास्पद भूमिका के बाद उभरे राष्ट्रव्यापी जनान्दोलन के अभी चर्चे कायम ही हैं या संघ भाजपा के नेताओं के दलित विरोधी बयानों एवं कार्रवाइयों के सिलसिले या दलितों एवं आदिवासियों के लिए आरक्षण की नीति पर पुनर्विचार करने की उनके अग्रणियांे की बातें - आदि की पृष्ठभूमि में फूट पड़े दलितों के इस आक्रोश ने अखिल भारतीय स्तर पर दलितों के बीच आधार व्यापक बनाने की हिन्दुत्व ब्रिगेड की सुनियोजित रणनीति को जबरदस्त धक्का पहुंचा है। निःस्सन्देह दलित आक्रोश ने न केवल राज्य एवं केन्द्र के स्तर पर उन्हें बचावात्मक पैंतरा अख्तियार करने के लिए मजबूर किया है बल्कि एक हिन्दू समाज सुधारकघोषित करते हुए डा अम्बेडकर को अपनी राजनीति में समाहित करने की योजना को भी फिलवक्त धराशायी किया है। 

हिन्दू एकता को लेकर उनके जो भी दावे हों, यह घटना - जिसे अपवाद नहीं कहा जा सकता और जो दलितों को बुनियादी मानवाधिकार से वंचित करने, उन्हें प्रताडित करने और उन्हें अल्पसंख्यक विरोधी कार्रवाइयों में तूफानी दस्तों के तौर पर इस्तेमाल करने के लम्बे सिलसिले का ही एक हिस्सा है - उसने असमावेश और नफरत पर टिकी उनकी मनुवादी/ब्राहमणवादी विचारधारा के सारतत्व को ही बेपर्द किया है। दरअसल उनका विश्वनज़रिया दलितों के सशक्तिकरण/मुक्ति या समावेशी विकास की किसी किस्म की दृष्टि /विजन के प्रतिकूल बैठता है। और प्रस्तुत घटना और उसके बाद उमड़े जनाक्रोश ने इसे फिर एक बार प्रमाणित किया है कि मामूली बहानों का इस्तेमाल करते हुए जमीनी स्तर पर दलितों और मुसलमानो के बीच तनाव बढ़ाने की उनकी तमाम कोशिशों के बावजूद, हिन्दु राष्ट्र के उनके नज़रिये में दोनों की हैसियत एक जैसी ही है। एक ऐसे राज्य में, जहां विगत पन्दरह सालों से हिन्दुत्व की ताकतें हुकूमत में हैं, और जिसे उन्होंने 2014 में हुए संसदीय चुनावों के पहले विकास के गुजरात मॉडलके तौर पर प्रस्तुत किया था, वहां दलितों द्वारा प्रगट अभूतपूर्व गुस्से ने उन्हें अन्दर तक हिला दिया है और वह समाधान की बदहवास कोशिशों में लगे हैं। उन्होंने महसूस किया है कि दलित अवाम का यह उभार विभिन्न राज्य विधानसभाओं - पंजाब, उत्तर प्रदेश और गुजरात आदि - के आसन्न चुनावों में जो 2017 में सम्पन्न होने हैं, उनके तमाम राजनीतिक समीकरणों को बिगाड़ देने की क्षमता रखता है।

दलित विद्रोहके वर्तमान चरण का एक अन्य विवादास्पद पहलू मीडिया की भूमिका को लेकर सामने आया है जिसने (अपवादों को छोड़ दें तो) एक तरह से हिन्दुत्व की असमावेश केन्द्रित राजनीति का प्रवक्ता बनना कुबूल किया है। अगर हम कार्पोरेट नियंत्रित और उनकी मिल्कियत वाले मीडिया द्वारा किए जानेवाले घटनाओं के कवरेज को देखें तो पता चलता है कि उसने उन तमाम विशाल दलित लामबन्दियों की वस्तुनिष्ठ रिपोर्ट देने से लगातार इन्कार किया है, जिसने हिन्दुत्व की राजनीति को चुनौती दी है तथा उस पर सवाल खड़े किए हैं। वर्णमानसिकता के प्रभुत्ववाले उनके दलितद्रोही दृष्टिकोण का एक प्रातिनिधिक उदाहरण हाल में ही सामने आया था जब उन्होंने मुंबई में भाजपा-शिवसेना सरकार द्वारा अम्बेडकर भवन को गिराये जाने की घटना के खिलाफ वहां की सड़कों पर उतरे डेढ लाख से अधिक के जनसैलाब को अपने कवरेज में कोई अहमियत नहीं दी थी। मीडिया के जनतंत्र का प्रहरी होने की बात जो बार बार की जाती है, घटनाओं के समाचार देने और विश्लेषण में उसके वस्तुनिष्ठ होने की जो बात की जाती है, मगर यहां यह नज़र आ रहा है कि सत्ताधारी जमातों के एक प्रवक्ता के तौर पर उनके रूपांतरण में उन्हें कोई गुरेज नहीं है। निश्चित ही यह ऐसी स्थिति है जो आपातकाल से भी बुरी है जब उन्हें झुकने के लिए कहा गया था और वह रेंगने लगे थे 

इस बात पर जोर दिया जाना जरूरी है कि गोरक्षा के नाम पर बने इन हथियारबन्द समूहों की आक्रामक कार्रवाइयों का दायरा दलितों तक सीमित नहीं है, दरअसल, मुसलमान उनके निशाने पर मुख्य तौर पर रहे हैं - जैसा कि विगत दो साल की घटनाओं पर सरसरी निगाह डाल कर पता किया जा सकता है। इनमें सबसे ताज़ी घटना की रिपोर्ट गुड़गांव से आयी थी जब दो मुसलमान टान्स्पोर्टरों पर एक गोरक्षक समूह ने हमला किया और उन्हेंगोमूत्र में सना गोबर खाने के लिए मजबूर किया - जब उन्होंने पाया कि उनके वाहन में कुछ पशु मौजूद थे। प्रस्तुत घटना का एक विडिओ भी वायरल हुआ है जिसमें समूह का नेता कैमेरा पर दावा करता है कि इन तस्करों को उनके पापों से मुक्त करने के लिए उन्होंने इस काम को अंजाम दिया। और चूंकि सूबा हरियाणा में भाजपा का शासन है - जो वहां होमगार्ड के तर्ज पर गोसुरक्षा दलके गठन के बारे में विचार कर रहा है और उसने गोतस्करीको काबू में करने के लिए आई ए एस स्तर का एक विशेष अधिकारी नियुक्त किया है, इन अत्याचारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई।

अभी पिछले साल की ही बात है जब पलवल, हरियाणा में साम्प्रदायिक दंगे जैसी स्थिति उत्पन्न हुई। इस घटना का फौरी कारण था गोरक्षा के नाम पर बने इन हथियारबन्द समूहों ने मीट ले जाने वाले एक ट्रक पर हमला किया और यह अफवाह फैला दी कि उसमें गोमांस/बीफ ले जाया जा रहा है। पुलिस वहां तुरंत पहुंची और हमलावरों के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय उन्होंने ट्रक के चालक एवं मालिक के खिलाफ आपराधिक षडयंत्रा की धारा के तहत मुकदमा दर्ज किया और उन्हें जेल भेजा। अगले ही दिन सरकार ने ऐलान किया कि गोरक्षकोंपर पहले दर्ज मामलों को वापस लिया जाएगा और एक तरह से इस बात का संकेत दिया कि भविष्य में ऐसी घटनाएं हो तो उन्हें कोई चिन्ता नहीं होगी। 

पिछले साल दिसम्बर के अन्त में, जिला करनाल /हरियाणा/ के बनोखेड़ी गाव में एक मिनी टक पर गोरक्षा के नाम पर बने ऐसे समूहों द्वारा गोली चलाये जाने की घटना हुई जिसमें सिर्फ लोग सवार थे - इनमें से अधिकतर अल्पसंख्यक समुदाय से ताल्लुक रखते थे और जो राज्य मंे होने वाले पंचायत चुनावांे में भाग लेने के लिए पंजाब से उत्तर प्रदेश जा रहे थे। /देखें, लोक लहर, 14 दिसम्बर 2015/ गोली चलाने की इस घटना में एक युवक की मौत हुई और कई लोग बुरी तरह घायल हुए। गोरक्षकों ने इस टक पर मध्यरात्रि के वक्त़ हमला किया था और अधिक चिन्तनीय बात थी कि इस समूह के साथ कुछ पुलिसवाले भी चल रहे थे। इस घटना को लेकर जब हंगामा हुआ तब पांच लोग गिरफतार हुए जिनमें दो पुलिसवाले भी शामिल थे।

गोरक्षा के नाम पर बने इन समूहों का आतंक किसी खास इलाके या राज्य तक सीमित नहीं है, वह समूचे देश में फैला है। कुछ माह पहले ऐसे ही एक गिरोह ने अल्पसंख्यक समुदाय के दो युवकों को /जिनमें से एक अल्पवयस्क था/ लतेहार, झारखण्ड में बुरी तरह यातनाएं देकर पेड़ पर फांसी पर लटका दिया था क्योंकि वह युवक मवेशी का व्यापार करते थे और गोरक्षक उन्हें सबक सीखाना चाह रहे थे।हिमाचल प्रदेश के जिला नाहन का साराहन गांव अल्पसंख्यक समुदाय के युवकों के एक समूह पर ऐसे ही एक गोरक्षक गिरोह के हमले का प्रत्यक्षदर्शी बना था, जिसमें एक युवक की मौत हुई थी और चार अन्य को गंभीर चोटें आयी थीं। /अक्तूबर 2015/ गोरक्षकों ने आरोप लगाया कि यह युवक गोतस्करी में लिप्त थे। पिछले साल ऐसे ही एक समूह ने कश्मीर की ओर जा रहे एक टक पर रात में उधमपुर में पेटोल बम से हमला किया था जिसमें जाहिद नामक युवक /उम्र 19 वर्ष/ जलने के चलते भयानक पीड़ा भरी मौत हुई थी और उसके साथी घायल हुए थे। यह अकारण नहीं कि कुछ माह पहले जम्मू और कश्मीर की मुख्यमंत्राी सुश्री मेहबूबा मुफ़्ती ने पंजाब के मुख्यमंत्री  को बाकायदा पत्र लिखकर बताया कि किस तरह राज्य  के मीट निर्यातक और व्यापारियों को स्वयंभू गोभक्तों से नियमित तौर पर प्रताडित किया जा रहा है और इस मामले में दखलंदाजी करने की उनसे अपील की थी। 

यह उम्मीद करना बेवकूफी होगी कि भाजपा - जो राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ का आनुषंगिक संगठन है - गोरक्षा के नाम पर चले इन गिरोहों पर अंकुश लगाएगी क्योंकि दलितो का एक हिस्सा उनके द्वारा अंजाम दी गयी घटना से उद्वेलित है या न्यायपालिका तथा कार्यपालिका के नुमाइन्दे संवैधानिक मूल्यों और सिद्धांतों की उनके द्वारा की जा रही खुलेआम अवहेलना को लेकर चिंतित हैं या देश की अमन और इन्साफपसंद अवाम प्रचारक से प्रधानमंत्राी बने जनाब मोदी को इस बात की याद दिला रही है कि अपना पदभार ग्रहण करते हुए उन्होंने संविधान के सबसे पवित्रा किताब होने की बातकही थी।

हमें नहीं भूलना चाहिए कि संघ परिवार, आनुषंगिक संगठनों के अपने विशाल नेटवर्क के जरिए संचालित होता है - जिनके बीच आपसी श्रम विभाजन होता है - ताकि हिन्दु राष्ट्र के अपने एजेण्डा को आगे बढ़ाया जा सके। दरअसल वह कोईभी कसर बाकी नहीं रखेगा ताकि जनता का ध्यान उनकी बुनियादी वर्णमानसिकता की तरफ न जाए जो यह बात स्वीकारने के लिए भी तैयार नहीं होते कि दलितों के दावेदारी की जड़े सदियों पुरानी जाति व्यवस्था की संरचना में छिपी हैं। वे उन तमाम आवाज़ों को खामोश करने के लिए किसी भी सूरत तक जा सकते हैं, जो उन्हें प्रश्न कर रही हैं, उन्हें चुनौती दे रही है और विजय के उनके पथमें बाधाएं खड़ी करने की क्षमता रखती हैं। ऐसी तमाम आवाज़ों के लिए आनेवाले दिन किस तरह चुनौती भरे हो सकते हैं इसका अन्दाज़ा हम गुजरात में दलित अत्याचारों को लेकर राजधानी दिल्ली में आयोजित धरने पर ऐसे एकसंगठन द्वारा किए गए हमले में देख सकते हैं जिसे हिन्दुत्व ब्रिगेड का करीबी कहा जा रहा है। 

गुजरात के मॉडल राज्यमें दलितों पर हो रहे हमले या दलितों पर अत्याचार की घटनाओं में लगातार हो रही बढ़ोत्तरी उन तमाम दलित नेताओं के सामने एक उलझन भरा सवाल पेश करती है जिन्होंने मोदी के सत्तारोहण के पहले उनके साथ जुड़ना कबूल किया था और एक तरह से गुजरात दंगों के दिनों में /2002/ जब वह मुख्यमंत्राी थे, उनकी विवादास्पद भूमिका के साफसुथराकरण में भूमिका अदा की थी। क्या अब भी आठवले, उदित राज और पासवान जैसे लोग सत्ता से चिपके ही रहेंगे, कुछ पद पाकर सन्तुष्ट रहेंगे और इस दलित विरोधी और उत्पीड़ित विरोधी हुकूमत की वास्तविकता उजागर न हो इस मुहिम में जुटे रहेंगे या वह गुजरात की सड़कों पर दलितों द्वारा दिए गए उदघोष को सुनेंगे कि बिना राष्टीय स्वयंसेवक संघ और मोदी की अगुआईवाली भाजपा से टकराव लिए दलित मुक्ति की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

उजागर होता दलित आक्रोश दलित आन्दोलन के सामने भी महत्वपूर्ण प्रश्न उपस्थित करता है। क्या सड़कों पर फूट पड़ता यह आक्रोश यूं ही विलुप्त हो जाएगा या वह जाति उन्मूलन और पूंजीवाद के खिलाफ संघर्ष के अम्बेडकरवादी सियासत के रैडिकल एजेण्डा को पुनर्जीवित कर सकेगा और समानधर्मा ताकतों के साथ व्यापक गठबन्धन कायम करते हुए मनुवादी/हिन्दुत्ववादी ताकतों के सामने एक व्यवस्थागत चुनौती पेश कर सकेगा। बहुजन समाज पार्टी जैसे संगठनों को - जो अपने आप को दलितों की पार्टी कहते हैं - उन्हें इस मसले पर अभी बहुत कुछ जवाब देने हैं।

निस्सन्देह गोरक्षा के नाम पर स्वयंभू गिरोहों की कारगुजारियां और दलितों एवं अल्पसंख्यकों पर ऐसे गिरोहों के हमलों को लेकर प्रधानमंत्राी की चुप्पी ने मौजूदा हुकूमत के वास्तविक एजेण्डा को और बेपर्द किया है। विश्लेषकों का अनुमान है कि अपने दलितद्रोही नज़रिये की भारी कीमत उसे आनेवाले चुनावों में चुकानी पड़ेगी। यह बात वैसे अभी भी अस्पष्ट है कि किस तरह वे तमाम ताकतें, संगठन जो हिन्दुत्व के एजेण्डा की मुखालिफत करते हैं और जो देश में धर्मनिरपेक्षता की हिमायत करने के लिए प्रेरित है तथा जनतंत्रा के जमीनी स्तर पर अधिकाधिक विस्तार के लिए प्रतिबद्ध हैं, वह क्या रणनीति बना रहे हैं ताकि हिन्दुत्व के असमावेशी एजेण्डा को न केवल चुनावों के स्तर पर बल्कि सामाजिक स्तर पर भी शिकस्त दी जा सके और वाम की ताकतें ताजे़ दमखम के साथ इसमें क्या भूमिका निभा रही हैं। यह बात अभी देखी जानी बाकी है कि हिन्दुत्व की सियासत जिस तरह देश के लिए ख़तरा बन कर उपस्थित हैं, उस परिस्थिति की गंभीरता को समझते हुए क्या जमीनी स्तर पर सामाजिक-राजनीतिक ताकतों का समानान्तर गठजोड़ सामने आ सकेगा ?
मौजूदा समय देश के अपने इतिहास में एक ऐसा अवसर है, जो प्रचण्ड संभावनाओं से भरा है और इन्कलाबी वाम से यह अपेक्षा की जाती है कि वह तेजी से बदलती इस परिस्थिति में अपने स्रजनात्मक, उर्जावान और रणनीतिक हस्तक्षेप को आगे बढ़ाए।

इस सम्बन्ध में तीस के दशक में फासीवादी विरोधी संघर्ष के दिनों में उठे ऐतिहासिक नारे को याद कर सकते हैं जब ऐलान किया गया था कि फासीवाद को आगे नहीं बढ़ने दिया जाएगा।’ (फासीजम विल नाट पास) वह ऐसा वक्त़ था जब कम्युनिस्टों, अराजकतावादियों, समाजवादियों और गणतंत्रावादियों का संयुक्त मोर्चा बना था और जो कंधे से कंधा मिला कर लड़ रहे थे और जिनका साथ देने के लिए नगरों और गांवों से भी आम लोग पहुंच रहे थे क्योंकि सबने इस बात को बखूबी समझा था कि फासीवाद की जीत के स्पेन के लिए क्या मायने हो सकते हैं। 

अब शायद जरूरत है कि ऐसे तमाम अनुभवों से सीखने की और 21 वीं सदी में उसके संस्करण का मुकाबला करने के लिए अधिकतम व्यापक एकता कायम करने की और जोरदार ऐलान करने की कि साम्प्रदायिक फासीवाद को रोक दिया जाएगा।’ 




Monday, July 25, 2016

[Statement] Cow Vigilantism as Terror: Can the Saffron Establishment ever wash its hands of the growing menace?

- New Socialist Initiative

Cow vigilantism which has received tremendous boost since the ascendance of BJP at the centre got its first fitting reply in Gujarat recently. The way in which a self-proclaimed Gau Rakshak Dal - owing allegiance to Shiv Sena - attacked a group of Dalits in Una (11 th July 2016) who were skinning a dead cow, publicly flogged them, led them to the police station charging them with cow slaughter and even circulated a video of the whole incident on social media to spread further terror, has caused tremendous uproar.

Thousands and thousands of Dalits have come out on streets in different parts of the state, gheraoed government offices, damaged government property, enforced state-wide bandh and tried to bring the government to its knees, demanding severe punishment to the guilty and strict action against the police and government officials who failed to act upon their complaint when they were being publicly brutalised. 

The wave of protests has still not ebbed. The anger still simmers. Protest rallies still continue. 

There have been thirty incidents of suicide attempts by Dalit youth protesting the Una incident within a span of just one week. People across political spectrum are appealing to the angry youth not to resort to this extreme step and continue with peaceful struggle. Undoubtedly, Una incident and the consequent dalit assertion is proving to be a great turning point in the history of the dalit movement as Dalits have ultimately realised that politics of Hindutva is no friend of dalits and in fact, it is geared towards strengthening and further consolidating the purity and pollution based caste system.The growing disenchantment of Dalits with the politics of Hindutva was very much evident when their protests reached Narendra Modi's home town of Vadnagar itself where thousands of dalits participated in a militant demonstration blaming the Prime Minister himself and BJP for the brutal thrashing of Dalits. Videos of the protest showed many Dalit people shouting, “Hai re Modi...hai-hai re Modi,” - modification of a slogan used by women during Hindu funeral processions. The outrage has rekindled memories of the militant assertion in early eighties led by the earlier generation of young dalits wherein they had fought to defend policy of reservation and also dared to take on the Hindutva formations head-on. 

It has also been a great learning experience for ordinary dalits in the state who comprise around eight per cent of the population and who were largely co-opted by the Hindutva formations in their project of hate and exclusion. One unique form of struggle adopted by the protesters this time has rattled the ruling elite tremendously and has the potential of nationwide resonance. It involved throwing of carcasses of dead cows at government offices, outside the houses of prominent politicians, removal of which became a strenuous affair even for the establishment. A large section among them have even boycotted work of collecting dead bovines and have even declared that henceforth they are ready to die of hunger but would not take up the occupation again. In fact, by this simple act Dalits have rather issued a warning to the Manuvadi/Brahminical forces that the day they resolve to leave all those 'dirty' professions. for which they are stigmatised, a catastrophe like situation awaits them. One of the activists who 'pioneered' this unique form told a correspondent that they have stopped doing it to teach them a lesson


Fact finding reports which have appeared in sections of the media tell how the police did not stop the perpetrators on their way and also took hours to lodge a simple FIR and arrest the criminals. There are even unconfirmed reports that local police had even tipped the Gau Rakshak Dal about the skinning of the dead cow. The complicity and connivance of the local police is evident also in the fact that despite enough proof available with it in the form of the video of the incident about involvement of more than thirty people in the thrashing incident, it has kept number of arrests limited at eight only and is trying to portray it as an one off incident.

The unfolding dalit outrage which found the state government in deep slumber has brought to the fore many other similar recent incidents where Dalits had come under attack at the hands of Gau Rakshaks and the silence maintained by the police which had even refused to entertain complaints lodged by the victims. It has also given a vent to pent up anger of the dalits against daily humiliations and discrimination faced by them, widespread existence of exclusion and untouchability in social life, denial of basic human rights and manifold spurt in atrocities in the state in recent times and failure of the powers that be to take proactive measures to curb the growing menace

The criminal acts by the Gau Rakshaks and the impunity with which they are ready to take law into their hands which has received nationwide attention has also been an occasion for the senior members of the bureaucracy to speak out about the menace they have become all over the state. Chief Secretary of the state G R Gloria is reported to have told a national daily that:

'These vigilantes are self-proclaimed gau rakshaks but in actual fact they are hooligans'. According to him there are as many as 200 cow vigilante groups in the Gujarat who have 'become a law and order problem because of their aggression and the way they take law into their hands' and government is going to take strong action against them. The Chief Secretary was even categorical in admitting that lower level police personnel are hand in glove with these vigilantes.

It is worth emphasising that not some time ago even the Punjab-Haryana high court while ordering CBI probe into the death of Mustain, a transporter at the hands of members of another 'Gau Raksha Dal' in Kurukshetra, Haryana (March 2016) had underlined the growing criminalisation of the Cow Protectors who work with impunity. It said that so called cow vigilante groups constituted with the backing of political bosses and senior functionaries governing the state, including police,

"..[a]re bent upon circumventing law and fleecing poor persons ferrying their animals, be it for any personal domestic use or otherwise...Apparently even the senior functionaries of the police are hand-in-glove with such vigilante groups.

Image: http://www.gaurakshadalharyana.org/


Dalit anger witnessed on the streets of Gujarat - variously described as Dalit rebellion by a section of the commentators - has had spiralling effect in other parts of the country as well, and has also helped galvanise the entire parliamentary opposition camp which has even demanded that there should be immediate ban on all such Gau Rakshak Dals and all such miscreants who operate under its name and engage in mayhem. Members of parliament on the floor of the house have denounced all these vigilante groups who are targeting Muslims as well as Dalits, brutalising them in very many ways and on occasions lynching them and explained how the policies and programmes of the powers that be has made a conducive atmosphere for their proliferation and demanded ban on them. 

Sunday, July 24, 2016

बरवक्त यहां 'गाय' कानून तोड़ने का सुरक्षित तरीका

सुभाष गताड़े

Courtesy Cartoonist Satish Acharya 
गोभक्त बालू सरवैया- जिन्होंने एक गाय भी पाली थी- ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि मरी हुई गाय की खाल निकालने के अपने पेशे के चलते किसी अलसुबह उन पर गोहत्या का आरोप लगाया जाएगा और उन्हें तथा उसके बच्चों को सरेआम पीटा जाएगा. इतना ही नहीं किसी गाड़ी के पीछे बांध कर अपने गांव से थाने तक उनकी परेड निकाली जाएगी.

उना, गुजरात की इस घटना ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया है. पिछले दिनों इस मसले पर बात करते हुए गुजरात सरकार के चीफ सेक्रेटरी जीआर ग्लोरिया ने गोरक्षा के नाम पर चल रही गुंडागर्दी को रेखांकित किया. उन्होंने बताया कि समूचे गुजरात में दो सौ से ज्यादा ऐसे गोरक्षा समूह उभरे हैं जो ‘अपने हिंसक व्यवहार के चलते और जिस तरह वो कानून को अपने हाथ में लेते हैं, उसके चलते कानून और व्यवस्था का मसला बन गए हैं.’

ग्लोरिया ने अपने बयान में यह भी जोड़ा कि ऐसे समूहों के खिलाफ हम सख्त कार्रवाई करनेवाले हैं क्योंकि भले ही यह ‘स्वयंभू गोभक्त हों मगर वास्तव में गुंडे हैं.’ शहर से गांव तक फैले उनके नेटवर्क तथा स्थानीय पुलिस के साथ उनकी संलिप्तता आदि बातों को भी उन्होंने रेखांकित किया.

ध्यान रहे कि यह पहली दफा नहीं है जब गोरक्षा के नाम पर बढ़ रही असामाजिक गतिविधियों की तरफ संवैधानिक संस्थाओं या उनके प्रतिनिधियों की तरफ से ध्यान खींचा गया हो. अभी ज्यादा दिन नहीं हुआ जब पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने भी इसी बात को रेखांकित किया था. 

अदालत का कहना था कि ‘‘गोरक्षा की दुहाई देकर बने कथित प्रहरी समूह जिनका गठन राजनीतिक आंकाओं एवं राज्य के वरिष्ठ प्रतिनिधियों की शह पर हो रहा है, जिनमें पुलिस भी शामिल है, वह कानून को अपने हाथ में लेते दिख रहे हैं.’

मालूम हो कि अदालत उत्तर प्रदेश के मुस्तैन अब्बास की हरियाणा के कुरूक्षेत्र में हुई अस्वाभाविक मौत के मसले पर उसके पिता ताहिर हुसैन द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी. समाचार के मुताबिक पांच मार्च को मुस्तैन शाहबाद से भैंस खरीदने निकला, जब उसके पास 41,000 रूपए थे. 

उसे कथित तौर पर गोरक्षा दल के सदस्यों ने पकड़ा और पुलिस को सौंप दिया. याचिकाकर्ता के मुताबिक 12 मार्च को शाहबाद की पुलिस ने उसे छोड़ने का आश्वासन दिया मगर उसे बाद में धमकाया और पीटा.

Friday, July 22, 2016

कश्मीर के ताज़ा घटनाक्रम पर 'न्यू सोशालिस्ट इनिशिएटिव', दिल्ली चैप्टर का वक्तव्य

- न्यू सोशालिस्ट इनिशिएटिव

कश्मीर की घाटी फिर एक बार अशांत है। अपनी जिन्दगी की आम दिनों की दिनचर्या को छोड़ कर लोग सड़कों पर हैं। न केवल युवा बल्कि बच्चे और महिलाएं भी घरों से बाहर निकल कर भारतीय राज्य की सैन्य ताकत को चुनौती दे रहे हैं। पुलिस एवं सेना का बचा खुचा डर भी विलुप्त होता दिख रहा है। न केवल पुलिस थाने बल्कि सीआरपीएफ के शिविर भी हमले की जद में आए हैं। जनअसन्तोष से उर्जा ग्रहण करते हुए एक किस्म के जनविद्रोह की स्थिति बनती दिख रही है। एक सप्ताह के भीतर भारत के सुरक्षा बलों के हाथों चालीस लोगों की मौत हो चुकी है। पुलिस द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले 'गैरप्राणघातक’ कहे जाने वाली छर्रों से सैकड़ों लोगों की आँखों को ही नहीं बल्कि तमाम अन्य किस्म की गंभीर शारीरिक हानि हुई है। जबकि लोग पुलिस, अर्द्धसैनिक बलों और सेना का मुकाबला कर रहे हैं, कश्मीर में भारतीय राज्य के अन्य अंग - चुनी हुई सरकार के प्रतिनिधि, नौकरशाही, विधानसभा एवं पंचायतों के चुने हुए सदस्य - सभी कहीं सार्वजनिक स्थानों पर दिख ना जाने के डर से कहीं दुबके हुए हैं। फिलवक्त़ कश्मीर की घाटी के लोग बनाम भारतीय राज्य की संगठित हिंसा की संस्थाओं के बीच ही टकराव तेज होता दिख रहा है।

हालांकि जनअसन्तोष के ताजे सिलसिले का फौरी कारण हिजबुल मुजाहिदीन के लड़ाके बुरहान वानी का मारा जाना है, लेकिन इस गुस्से का कारण और गहरा है और उसका लम्बा इतिहास है। कश्मीरी आवाम के आत्मनिर्णय के अधिकार को कुन्द किया जाना और उनका दमन इस विवाद की जड़ में है। इस दमन ने तमाम एकांतिक रूप ग्रहण किए हैं। बीते पचीस सालों से कश्मीर की घाटी दुनिया की सबसे सैन्यीकृत जगहों में शुमार हुई है। भारतीय सेना और अर्द्धसैनिक बलों से जुड़े पाँच लााख से अधिक लोग राज्य में और पाकिस्तान के साथ जुड़ी उसकी सरहद पर तैनात हैं। राष्ट्रीय राइफल्स और सीआरपीएफ के शिविर जगह जगह फैले हुए हैं। हाईवे पर जगह जगह बनाए गए चेकपाइंटस और कभी भी की जा सकनेवाली तलाशी कश्मीरी आम जीवन का हिस्सा बन चुकी है। हजारों लोग गायब हैं, जिन्हें सुरक्षा बलों ने उठा लिया है, और पूछताछ कैम्प के अंधकूप में गोया फेंक दिया गया है, जिनमें से कई फिर अचिन्हित कब्रों में पहुंच गये हैं। घृणित सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम/आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट ने भारत की सेनाओं को - गरिमामय जीवन जीने के आम कश्मीरियों के बुनियादी अधिकार पर हमला करने की - छूट प्रदान की है। अगर घाटी का आम निवासी चुनाव और प्रशासकीय पहल की भारतीय राज्य की आम दिनों की कार्रवाई से अपने आप को अलगाव में पड़ा पाता है, तो वह अपनी जमीन पर भारतीय सुरक्षा बलों की उपस्थिति के खिलाफ गहरे रूप में क्षुब्ध है। यह असन्तोष व्यापक जनआन्दोलनों में बार बार फूटता रहता है।


हर बार भारतीय राज्य की किसी कार्रवाई ने जनअसन्तोष को भड़काने में चिंगारी का काम किया है। बीते समय अमरनाथ यात्रा ट्रस्ट को राज्य सरकार द्वारा जमीन हस्तांतरण का मसला वर्ष 2008 के व्यापक प्रदर्शनों की वजह बना। वर्ष 2009 मे कश्मीरी जनता शोपियां में दो महिलाओं के बलात्कार एवं हत्या के मसले के खिलाफ सड़कों पर उतरी। वर्ष 2010 का आक्रोश भारतीय सेना द्वारा की गयी तीन स्थानीय लोगों की हत्या और उन्हें सरहद पार के घुसपैठिये साबित करने के खिलाफ सड़कों पर फैला। अफजल गुरू को गोपनीय ढंग से दी गयी फांसी 2013 के जनाअन्दोलन की वजह बनी। सबसे शर्मनाक बात थी कि संप्रग सरकार ने अफजल गुरू की लाश को उसके परिवार को सौंपने से भी इन्कार किया था। जब भी पंचायत या विधानसभा के चुनाव सम्पन्न होेते हैं, या मिलिटेंसी से जुड़ी हिंसा की ख़बरें कम आने लगती हैं या कोई कश्मीरी युवा संघीय लोक सेवा आयोग के इम्तिहान में अव्वल स्थान पाता है, कथित मुख्यधारा का भारत, उसके राजनीतिक प्रतिष्ठान, मीडिया और बुद्धिजीवी समुदाय घाटी में ‘सामान्य स्थिति’ बहाल होने की बात करने लगते हैं। 

Friday, July 15, 2016

[NSI Statement] On the Unfolding Situation in Kashmir

- NSI Delhi Chapter

The valley of Kashmir is on the boil again. Forsaking the so-called normal routines of their lives, people are on the streets. Not just young men, but even children and women are out, challenging the military might of the Indian state. Any fear of the police and army appears to have been discarded. Police stations and even CRPF camps have been attacked. A popular upsurge, it is energised by mass fury. Forty people have lost their lives in one week at the hands of the Indian security establishment. Hundreds of others have suffered serious eye and other injuries from presumedly 'non-lethal' pellets used by the police. While people are out confronting the police, para-military and army, the other organs of the Indian state in Kashmir, the elected government and its bureaucracy, elected members of the legislature, panchayats, etc. are in a rathole, fearing public appearance. It is just the people of Kashmir valley versus the institutions of organised violence of the Indian state.



While the immediate cause of popular anger is the killing of Hizbul Mujahideen militant Burhan Wani, reasons for this anger go much deeper and have a longer history. The stifling and repression of the Kashmiri people's right to self-determination stands at the root of this conflict. This repression has taken on extreme violent forms. For twenty five years now, the Kashmir valley has been among the most militarised places in the world. More than half a million troops of Indian army and para-military forces have been stationed in the state and its border with Pakistan. Rashtriya Rifle and CRPF camps dot the land scape. Highway checkpoints and random searches are part of everyday life. Thousands of men have disappeared, been picked up by security forces, thrown in the black hole of interrogation camps, often ending up in unmarked graves. The hated AFSPA gives Indian security forces legal cover to assault basic rights of Kashmiris to live a life of elementary dignity. If an average valley resident is alienated from the normal practices of the Indian state such as elections and its administrative initiatives, s/he harbours deep resentment against the presence of Indian security forces in their homeland. This resentment has erupted in mass protests again and again. 

Each time it has been an action of the Indian state that has served as the spark. Protests in 2008 were in response to the state government's proposal to transfer land to the Amarnath Yatra Trust. In 2009 Kashmiris were protesting against the rape and muder of two women in Shopian. Protests in 2010 followed an Indian army unit killing three local men, and passing them off as infiltrators from across the border. The valley erupted once again in 2013 against the secret hanging of Afzal Guru. Most shamefully the then UPA government refused to hand over his body to his family. Each time panchayat or assembly elections are held without disruption, or instances of militancy related violence drops, or a Kashmiri youth achieves a high postion in UPSC examinations, so-called mainstream India, its political establishment, media and intellectual class begin singing the raga of 'return to normalcy' in the valley. Election rallies, brokering of state largesse, administrative measures, or personal success of a few individuals however can not fill the chasm that separates Kashmiris from the political community 'mainstream' Indians call their nation. This chasm has been deepening and widening ever since the arrest of Sheikh Abdullah in 1953 by the Nehru government, military style occupation of the valley from 1991, and has become unbridgeable even in principle with the creeping Hindutvaisation of the Indian nation. 

Citizens of India need to pay special attention to this latter process and its consequences for Kashmir. It is not uncommon to hear slogans like 'doodh maangoge kheer denge, Kashmir maangoge cheer denge' (We will give you creamy deserts if you ask for milk, we will cut you down if you ask for Kashmir) in mundane relgious functions in northern India. Increasingly public and aggressive display of religiosity seen elsewhere in India, is most clearly manifest in the annual Amarnath yatra. The yatra, seen as a mark of rigourous and serious religious commitment earlier, is now taken to be an assertion of Indian supremacy over the valley. Emboldened by this state support, Hindutva organisations have started inventing new Hindu pilgrimages in the valley. Increasing Hindutva aggression against Kashmiris can also be seen in the fatal attack on a trucker from the valley by gau rakshaks in Udhampur in October last year. In other parts of India Kashmiri students have been attacked and/or rusticated from universities for not being sufficiently 'nationalist'. Votaries of Hindutva see history, politics and social change in terms of the conflict between Hindus and Muslims. For them India’s control over Kashmir is a sign of victory of Hindus. As long as this control persists, no matter what price Kashmiris have to pay for it, they see no problem in Kashmir. This explains the utter lack of policy and strategy of the Modi government with regard to Kashmir and Pakistan. Modi's politics is based upon false bravado, loud mouthing, and theatrics. Peace in Kashmir, or with Pakistan, is none of its priorities.

Monday, June 27, 2016

IMPERIALISM IN TODAY’S WORLD


100 Years of Lenin’s Essay “Imperialism is the higher stage of capitalism”


Swadesh Kumar Sinha

Lenin wrote his famous essay “Imperialism is the higher stage of capitalism” from January - June 1916 in Zurich, Switzerland. Lenin had seen the new features emerging with the development of capitalism much before the First World War broke. Before the eighth decade of 19th century, capitalism was at the stage of free competition. After this the free competition smoothly transformed into monopoly at a fast pace. In his essay, Lenin proved that the First World War (1914-18) was actually an imperialist war from both sides. This war was fought for the division of the world, re-investments, enlarge the fiscal capital influence areas, capital distribution and redistribution among the imperialist powers. This war was the result of the modern monopoly capitalism and it proved that as far as there exists a private ownership of the means of production, imperialist wars are inevitable. “Capitalism today has evolved into a new world order of venomous financial grip of colonial loot and exploitation of vast colonial population of the world by a handful of ‘developed nations’. The booty of the loot is being distributed amongst two or three (America, Britain, Japan) most powerful dacoits backed by large military and lethal weapons.” They are dragging the entire world into this war of dividing this loot (This part is quoted from Lenin’s essay “Imperialism is the higher stage of capitalism”)

The rise of imperialism and its economic, political characteristics

Summing up and compiling this entire world’s historic development process, some major facts can be underlined in the form of few distinct characteristics of this period. Firstly, capital governed the entire world. Secondly, a capitalist world developed through a combination of western Europe, America and Japan. Thirdly, in these countries Capitalist National States’ rose. Fourthly, the world was divided into dominions. Nations of Asia, Africa, Latin America became dominions of some or the other capitalist nations. Fifth, during this process the capitalist nations completed a whole journey of colonial loot to capital export generated from business. Capital entered the dominions and literally broke the thousand years of running natural economy; a new colonial setup was started whereby capital generation techniques and processes were developed in such a limited and restrictive manner only to an extent which were beneficial to the colonialists. These countries colonialism actually converted into half-feudalism. Both orders continued, however colonialism ruled supreme. Sixth, during this time three types of socio-economic structures existed. First, capitalist social economic structure, which existed in western Europe, America and Japan. Second was a capitalist socio-economic structure with strong feudal remains. This was prevalent in eastern Europe, Russia, Spain, Portugal and Greece. In these capitalist national states were in the process of rising. Third one was the colonial social structure in which the capitalist framework was very much existing. Towards the end of this period the stage of Capitalism got converted to Imperialism. In this period, in February 1917 Burjua populist revolution started in Russia and in October, the same year under the leadership of Sarvhaara, world’s first socialist revolution happened. Here it is of prime importance to know that Russia was not a developed capitalist country yet. Contrary to the speculation of Karl Marx, the first socialist revolution took place in Russia instead of France, Britain or Germany where production powers were backward and a national market was under the process of formation. Russian revolution left a deep imprint upon the world. It greatly influenced and strengthened the struggles for national liberation in colonies against imperialism or feudalism.

With the Second World War, Britain who was competent enough to maintain its dominating position and influence in the First World War began losing its power. In the end of Second World War Russia, whose red army had defeated the fascist powers of Germany, emerged as a super power. On the other hand, after the war America replaced Britain & Europe from the leading position in the capitalist world. Germany, Japan and Italy were ruined and most of Europe was devastated. Britain had suffered great loss and was on the verge of Bankruptcy. Only America came out safe from the fire of war, except the bombardment of Pearl Harbor by Japan. Continuous supply of arms and ammunitions by America to its friendly nations contributed for emerging the world out of recession of the fourth decade and in forgetting the nightmares and pessimism of those years. American industries were prospering because they were saved from the destruction of war, rather getting others for the supply of arms and ammunitions during the war. After the war devastated Europe, especially Germany and Japan, were the opportune sites for the American investment capital.

This varied economic reality and power balance was codified in the “Bretton Woods Agreement of 1944”. The power of dollar gold standard was applied in the global finance system. Power of dollar was recognized by the capitalist world. On the other side after the war, a strong socialist block was established whose power was increasing fast. The victorious Russia, who had defeated the fascist Germany, was now a great power. People’s democratic states were formed in the countries of Eastern Europe. In 1949 under the leadership of Mao Tse Dung, a national democratic revolution took place in China. This was the first revolution in a backward and underdeveloped country by a party with peasant’s leadership. Here it is to be noted that all the countries of Asia, China, North Korea, Cambodia, Laos and Cuba, a Latin American country, wherever revolution succeeded, were backward, underdeveloped and not developed, capitalist countries. Russia itself was under the process of capitalist development at the eve of revolution.

Imperialism Today:

In the decade of nineties, in Soviet Russia and all the countries of Eastern Europe, socialist states were declined. In 1976, with the death of Mao Tse Tung Ki, capitalist restoration occurred in China too. There is no socialist block in the world today. Of course, state of Cuba and North Korea are known to be socialist states, but they also cannot be said basically socialist. Their sovereignty actually depends only on their military power.

Today, America has emerged as the only Super power of the unipolar globe, but it is to be kept in mind that within one or rather say half century, the world has changed completely. After the independence of ‘South Africa’ and ‘Namibia’, the age of direct colonialism has ended completely. Today it is impossible to make an old type colony and neither is it needed. In some exceptional countries like Iraq and Afghanistan too, colonialist America could not maintain its direct power for long. In today’s world, the colonialism is totally obsolete and the new world structures are born based on the ‘Independent Sovereign State’. In these independent nation states, feudal structures are broken and capitalist structures are formed. Capital is running smoothly throughout the globe, having no obstacles in the way. It is for the first time that capitalism has spread its roots in every nook and corner of the world. In these countries, feudal values are present deep in the superstructures of course, but those are not an obstacle for the capital flow. On looking at the main features of today’s imperialism we see the below mentioned tendencies to be prominent.

The birth of Sovereign nation states:

Nation states are politically independent today. Situation of twisting hands, imposing sanctions, threats by imperialist countries occur occasionally, but this is not the main aspect. Dominance of America over the world as a military power is a reality, but it is also a fact that it is the biggest debtor country in the world. Countries like China, India, Mexico and Brazil have emerged as big economies. They also are partners in the loot of Asia, Africa and Lain America. Many companies and corporations of China and India are becoming vast multinational corporations rapidly. In 2015 itself Indian multinational companies have invested 15 Arab dollars in America, creating 91,000 jobs there. Several Indian corporate companies are participating in the loot of Africa. The people of Africa are fighting against the loot of some of these companies. The all powerful America has faced humiliation by such small countries as Iran, Cuba and North Korea. Inspite of sanctions imposed by United Nations backed by America, North Korea is still going ahead with its ‘atomic and missile programs.’ America is compelled to lift the sanctions from the ‘long range missile programs’ of Iran according to their terms and conditions. Thus we see that the nations are neither the comprador nor the commission agents of imperialism, as many leftist thinkers and political parties say.

Globalization of Capital:

 By the 90s, most of the independent nations of third world have opened their door for flowing in the foreign capital smoothly, removing all the border restrictions. This opening was named as globalization. We can understand it much easily in reference to India. After the liberation from the colonial enslavement, the capitalist of most of the newly independent countries needed savings of their people for initial capital formation. For this, the mixed economy, blending public and private capitalism, was established. According to this, huge Public Enterprises were incorporated with people’s money (public finance). By the 90s, people’s private capitalists were now full of confidence and mixed economy was no more needed, rather it was now an obstacle. So in the decade of 90s, policies of quota and permit of Nehru – ages was abandoned and, in the name of structural adjustments all the hurdles from the way of multinational capital were removed. Special economic zones (SEZ) were established in countries like India and China. No normal laws, inducing labor laws are binding here. Infact, middle class has grown in these countries, which is bigger than the total population of Europe. The investment opportunities in the western world are vanishing fast, but in the third world countries there is a wide scope for capital investments. Twenty five years of liberalization have passed away and a majority population of farmers, shopkeepers and other members of the lower middle class are dispossessed and have got ruined. But all the national and regional parties promote these policies, leaving some minor disputes aside. A big chunk of middle class also supports their policies, as they have been actual beneficiaries of this liberalization.

Expansion of the capitalist democracy:

No system is better than the democracy for the uninterrupted expansion of capital and keeping the people unrest under control. In 2011 and 2012, the Jasmine revolutions in Egypt, Tunisia, Syria and other Arabian territories were aimed at establishing there, the capitalist democrats. Its wind is blowing in whole of the world today. Ruling class of many military ruled states and other repressionary regimes are compelled to give their people democracy rights.

Rise of protectionism, religious fundamentalism and fascism:

All these three tendencies are visible simultaneously in the contemporary world. It is an expression of expanding economic and social crisis of imperialism. In Europe and America, rise of extreme rightist parties of its own kind is visible. In about a dozen countries, blind nationalist parties and leaders have become strong. Not considering the real reason behind the pessimism cloud and doubt, these party leaders are declaring some pseudo enemy, the actual culprit. They are making noise about the flood of immigrants, the weakening of free competition in trade, the danger to the national boundary and national culture from these immigrants and other intruders. Donald Trump in America, National Party front and its leader Marine Leapen in France, Girt Bildars of Nederland, Vlams Block of Belgium, freedom party of Austria, Sweden democrats and Denis party of Denmark are among these parties and leaders. Popularity of such type of parties is increasing rapidly in Poland, Hungary and Turkey also. In America, “Donald Trump” who is far ahead in the process of the selection of the republican candidate for president ship, is demanding the ban upon Muslim immigrants naming them as dangerous for the civil security and American cultural identity. Today, in western Asia, Middle east and Africa, Islamic orthodox extremist movement ‘Boko-haram’, ‘Al-Qaida’, ‘Islamic State (IS)’ have created instability from Pakistan, Bangladesh, Afghanistan to Syria, Iraq, Libya, Turkey, Tanzania, Egypt. These organizations and their terrorist activities have created in whole of these areas, a frightening crisis. In Myanmar (Burma), Buddhist extremists are rising fast. The Buddhist extremist leader ‘Viratu’ is called the ‘Osama bin Laden’ of Myanmar. His followers are killing Muslims on a large scale.

Fascism and extremism are easily cultivated in capitalist democracies. In history, we have seen this in both Italy and Germany. Today India is a notorious example of this phenomenon. Here, the fascist party BJP of RSS family has become victorious and is in power today. It is sowing deep, the seeds of hatred against the leftist, rationalists and minorities in full speed. Many a leftist organization and thinkers believe that America and Western Europe are the only responsible countries for the spread of Muslim fundamentalism in west Asia and whole of the world. Though, this thought is one sided, however it is true that, in the 90s, America was supplying arms and ammunition to Taliban and Al-Qaida in Afghanistan against the Soviet military and helping them to fight out the soviet army. But we must not forget the Shia-Sunni tussle in Islamic world of 14th Century as a source of Islamic States and Al-Qaida. Today terrorists of Islamic State are the killing Kurds and Shia Muslims on a large scale. If these terrorists are dreaming of a Sunni Khalifat, one must see that behind the curtain, Iran and Saudi Arabia are playing their Shia-sunni Cards. Many a leftist organizations take them as the enemy of imperialism and asked to support them. They must not forget the lesson of 1979, when in Iran, communists had supported the orthodox Khumaini for the Islamic revolution against Shah, who just after coming to power suppressed and assassinated the communists. Today collaboration of America, Britain and other western powers together with Russia are bombarding heavily the power zones of Islamic State, using ultra-modern fighter plane and drones, in Syria, Libya, Iraq and thus pushing the world towards a grave crisis.

Rise of information and Cultural Imperialism:

in last 2 decades, in the developed capitalist countries, especially in America, Computer, Tele-communication, Internet and mobile phones have revolutionized the face of the world. The world has become a ‘global village’ due to ‘Information Technology’. The use of this technology in war especially that of man less drone, has changed the whole scenario of the war. Many sociologists are naming this phenomenon as the ‘Information Imperialism” or “Cultural Hegemony’. The western world is imposing a culture, language and thoughts of its own kind on whole of the world. Round the clock running television channels are promoting consumerism globally. But if the imperialists are getting advantage of this information technology, the agents of social change are also using it. In the recent years, the movements for democracy in Arabian world too were benefited with the same information technology.

The probabilities of the struggle against imperialism today:

By thoroughly analyzing the state of the world today, it is quite clear that Lenin’s explanation of imperialism given in 1916 is still valid today in its economical aspect. Monopoly of Capital has been expanded manifold. All imperialism is not a monolith, even today. It is infected with serious contradictions.  Deepening contradictions and quick repetitions of recession continuously are worsening the crisis. Feudalism and colonialism are being rubbed off from the canvas and capitalism has actually engulfed the world. All the previous revolutions, whether in Russia, China or other countries of Asia and Latin America, succeeded during the periods of worst crisis of the capitalism. But today the situation has been changed. Wherever the next great revolution will succeed, it will be the first revolution, directly against capitalism and against a democratic state of this or that kind. Lenin wrote that ‘Imperialism means war.’ Today too, this is a true saying. Today regional wars and civil wars are a norm in the entire world, which are nothing less than a world war destruction and pain. The grave problem of refugees from the war torn areas of Syria, Iraq, Libya, Afghanistan, Yemen, Tanzania, Sudan etc. is reflecting this reality well. The imperialist system of hyper exploitation under the American leadership (which is engaged in armed intervention and drone war in more than a dozen countries simultaneously and which is planning to invest about 200 Arab Dollars in the next decade for modernizing it’s nuclear war heads) is creating a dangerous volatile situation at the global stage endangering probability of various kind of wars. Even change in climate and environment deterioration is enhancing the probability of wars. Though only the climate change may cause the total devastation of our planet and human civilization. In the words of Lenin, in this situation, it is the duty of left that, they “face not only the economical but the political, national and all other contradictions, struggles, anger too,” which are continuously becoming the norms of our time. It means to create and expand such bold and militant global movement from ground level, whose main challenge will be to save the human society from the total destruction viz. imperialism which is understood as the foundation stone of capitalism of our times.

In the ‘communist manifesto’ written by Marx and Engels in 1848, Marx had called the proletariat to wage a war, against the regimes of capitalism in their countries, aiming at the building of a horizontal, equalitarian peaceful and stable social system, controlled by the united producers of the world themselves.

(This essay is based upon the writer’s own study and deliberations with other scholars. Readers are invited to participate in the discourse on the topics and matters raised in the essay)

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