सुभाष गाताडे
कल्पना की उड़ान भरना
हर व्यक्ति को अच्छा लगता है।
कभी कभी मैं सोचता हूं कि आज से 100 साल बाद जबकि हम
सभी – यहां तक कि इस
सभागार में मौजूद अधिकतर लोग – बिदा हो चुके होंगे तो आने वाले समय
के इतिहासलेखक हमारे इस कालखण्ड के बारेमें, जिससे हम गुजर रहे हैं, जिसकी एक एक
घटना-परिघटना को लेकर बेहद उद्वेलित दिखते हैं, ‘हम’ और ‘वे’ की बेहद संकीर्ण परिभाषा को लेकर
अपने पारिवारिक, सामाजिक एवं राजनीतिक फैसले लेते हैं, क्या कहेंगे ? आज हमारे लिए जो
जीवन मरण के मसले बने हैं और जिनकी पूर्ति के नाम पर हम किसी भी हद तक जाने को
तैयार हैं, उनके बारे में उनकी क्या राय होगी ? क्या वे इस सदी में सामने आए
जनसंहारों के अंजामकर्ताओं को लेकर उतनीही अस्पष्टता रखेंगे और कहेंगे कि मारे गए
लोग दरअसल खुद ही अपनी मौत के जिम्मेदार थे, जिन्होंने खुद मृत्यु को न्यौता
दिया था ? क्या वह किसी
वैश्विक मानवता के तब लगभग सर्वस्वीकृत फलसफे के तहत इस दौर की घटनाओं को देखेंगे
और अपने अपने ‘चिरवैरियों’ के साथ हमारे रक्तरंजित संग्रामों
पर एक अफसोस भरी हंसी हंस देंगे ?
स्पष्ट है कि
स्थान एवं समय की दूरियां किसी विशाल कालखण्ड की वस्तुनिष्ठ आलोचना करने का मौका
प्रदान करती हैं। दरअसल जब हम खुद किसी प्रवाह/धारा का हिस्सा होते हैं तब चाह कर
भी बहुत वस्तुनिष्ठ नहीं हो पाते हैं, समुद्र की खतरनाक लगनेवाली लहरों पर
सवार तैराक की तुलना में किनारे पर बैठा वह शख्स कई बार अधिक समझदार दिख सकता है, जिसे भले तैरना न
आता हों, मगर जिसके पास
लहरों का लम्बा अध्ययन हो।
सौ साल से अधिक वक्त़ गुजर गया उन्नीसवीं
सदी की इस त्रायी के सबसे ‘युवा’ सदस्य विवेकानन्द का इन्तक़ाल हुए।
इस दौरान निश्चित ही बहुत कुछ बदला है। राजनीतिक आज़ादी मिली है। समाजी जीवन ने भी
बहुत करवट ली है। बहुत कुछ बदला है।
मगर बहुत कुछ नहीं भी
बदला है।
आज जो मुल्क हमारे सामने है उसमें हम
इन तीनों शख्सियतों के अक्स को आसानी से देख सकते हैं। निश्चित ही इसके अलावा तमाम
अन्य शख्सियतें या तंजीमों/संगठनों के अक्स देखे जा सकते हैं जिन्होंने अवाम की
दशा एवं दिशा बदलने के लिए अपने हिसाब से काम किया।
सेमिनार के लिए भेजे गए ‘कन्सेप्ट नोट’ में इन तीनों के बारे में चन्द बातें लिखी गयी हैं
सेमिनार के लिए भेजे गए ‘कन्सेप्ट नोट’ में इन तीनों के बारे में चन्द बातें लिखी गयी हैं
विवेकानन्द मानते थे कि लड़ाकू
हिन्दुइजम के पुनर्जीवन के जरिए वास्तविक सामाजिक आजादी हासिल हो सकती है’ जबकि दयानन्द सरस्वती के बारे में लिखा गया है कि किस तरह वह‘ अतीत को पुनर्जीवित करना चाहते थे,’ अगर हम अगल बगल देखेंगे तो आसानी से ऐसी ताकतों को हमारे बीच पहचान
सकते हैं जो किसी न किसी रूप में विवेकानन्द को आदर्श मान कर चल रही हैं ; जो दयानन्द के नक्शेकदम पर चलना चाहते हैं। और ज्योतिबा ने जिस
जातिविहीन, अतीत से पूरी तरह विच्छेद करनेवाले, स्त्राीमुक्ति के लिए प्रयासरत समाज का तसव्वुर किया था, उस धारा के अनुगामी भी मिल जाते हैं।
वैसे इसके पहले कि हम प्रस्तुतं विषय की
विवेचना करना शुरू कर दें मैं चाहूंगा कि अपने मन की आंखों के सामने सबसे पहले इन
तीनों शख्सियतों को लाने की कोशिश करें और यह ‘देखने’ की कोशिश करें कि
स्मृति-विस्मृति के अनवरत जारी द्वंद से छन कर इनके बारे में क्या क्या बातें
सामने आती हैं ?
हमारे मन की आंखों के सामने उस छोटेसे
मूलशंकर की छवि आती है जो रात में जग रहा है और शिव की मूर्ति पर बेखौफ दौड़ते
चूहों को देख रहा है और सवालों का एक छोटा घेरा उसके इर्दगिर्द खड़ा है, यह ‘सर्वशक्तिमान’ कहा जानेवाला
ईश्वर जिसे सभी लोग पूजते हैं, वह अगर खुद की रक्षा नहीं कर पा रहा
है तो भक्तों की कहां से कर सकेगा ? हम फिर युवा मूलशंकर से भी रूबरू
होते हैं जो अपने तमाम प्रश्नों के साथ जगह जगह दौरे पर निकला है, वहीं उसे अपने
गुरू दयानन्द सरस्वती (12 फरवरी 1824 -30 अक्तूबर 1883) नाम से सम्बोधित करते हैं। वेद एवं
संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान, वैदिक विचारधारा के पुनर्जीवन के
लिए प्रयास, संस्थापक आर्य समाज, हिन्दू धर्म में व्याप्त मूर्तिपूजा
और कर्मकाण्ड का विरोध। सत्यार्थ प्रकाश नामक ग्रंथ की रचना। और ढेर सारी बातें।
रामकृष्ण परमहंस के परम शिष्य स्वामी विवेकानन्द (12 जनवरी 1863 – 4 जुलाई 1902) का नाम लेने पर 1893 में शिकागो में
आयोजित पार्लियामेन्ट आफ वर्ल्ड रिलीजन्स में हिन्दु धर्म का परिचय देते हुए उनका
बहुचर्चित व्याख्यान याद आता है। पश्चिमी जगत में वेदान्त एवं योग के दर्शनों के
प्रसार में उनके योगदान की चर्चा सामने आती है, रामकृष्ण मठ की स्थापना की उनकी पहल, या बर्तानिया की
हुकूमत के अन्तर्गत भारत में हिन्दु धर्म के पुनर्जीवन में उनके हस्तक्षेप या
जगह-जगह व्याख्यानों का सिलसिला सभी कुछ आंखों के सामने नमूदार हो जाता है। और
बमुश्किल 39 साल की उम्र में उनके देहान्त का मंज़र भी सामने आता है।
बहुजनों, शूद्रों
अतिशूद्रो की मुक्ति के लिए सत्यशोधक समाज की स्थापना करनेवाले महात्मा ज्योतिराव
गोविन्दराव फुले (11 अप्रैल 1827 – 28 नवम्बर 1890) का नाम लेते ही उनकी जीवनसंगिनी
सावित्राीबाई फुले की तस्वीर भी सामने आती है और 1848 में लड़कियों के लिए उन्होंने पुणे
में खोला पहला स्कूल, अपने घर का कुआं सभी जातियों के लिए
खोलने की घटना या इसी वजह से उन्हें घर से बेदखल किए जाने की घटनाएं भी नमूदार हो
जाती है। कार्यकर्ता, विचारक, सामाजिक
क्रान्तिकारी फुले के जीवनपटल से उनकी जीवनसंगिनी सावित्राीबाई फुले (3 जनवरी 1831 – 10 मार्च 1897) को कहीं से अदृश्य नहीं किया जा
सकता, यह सच्चाई भी
सामने आती है।
19 वीं सदी की इन तीनों शख्सियतों में- जिनमें
सबसे युवा विवेकानन्द है – एक साझापन अवश्य दिखता है कि वे सभी
अपने उद्देश्य के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं और उसकी प्राप्ति के लिए अपनी तमाम
बौद्धिक एवं शारीरिक क्षमता उंडेल दिए हैं। इन तीनों की तुलना करें तो अपने मकसद
के प्रचार प्रसार के लिए सबसे दूर भ्रमण के लिए जानेवालों में विवेकानन्द हैं
जिसमें वह अमेरिका की भी यात्रा करते हैं, दयानन्द सरस्वती की भ्रमणगाथा भी
उतनीही रोमहर्षक है, बर्तानवी सामराजियों के नियंत्राण
में रहनेवाले हिन्दोस्तां में वह काफी घुमते दिखते हैं, जगह जगह
शास्त्रार्थ करते भी दिखते हैं और इनमें सबसे कम बाहर जानेवालों में – खासकर अपने
प्रांत के बाहर भी – जोतिबा फुले दिखते हैं।











