Friday, May 13, 2016

मौजूदा दौर में मजदूर

जावेद अनीस

1991 से शुरू हुए आर्थिक सुधारों के 25 वर्ष पूरे हो चुके हैं , इन 25 सालों के दौरान देश की जीडीपी तो खूब बढ़ी हैं और भारत दुनिया के दस बड़े अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो गया है, आज जब “महाबली” चीन सहित दुनिया भर की तमाम बड़ी अर्थव्यवस्थायें मंदी की गिरफ्त में है तो भारत अभी भी अंधो में काना राजा” बना हुआ है. लेकिन दूसरी तरफ इस दौरान लोगों के बीच आर्थिक दूरी बहुत व्यापक हुई है साल 2000 में जहां एक प्रतिशत लोगों के पास देश की कुल सम्पत्ति का 37 प्रतिशत था वहीं 2014 में यह बढ़ का 70 प्रतिशत हो गया है जिसका सीधा मतलब यह है कि इस मुल्क के 99 प्रतिशत नागिरकों के पास मात्र 30 प्रतिशत सम्पत्ति बची है यह असमानता साल दर साल बढ़ती ही जा रही है. आर्थिक सुधारों से किसका विकास हो रहा हैं इसे इस तथ्य से समझा जा सकता है कि मानव विकास सूचकांक के 185 देशो की सूची में हम 151वें स्थान पर पर बने हुए हैं.

किसी भी अर्थव्यवस्था के तीन प्रमुख घटक होते हैं पूँजी,राज्य व मजदूर, और अर्थव्यवस्था का माडल इसी बात से तय होता है कि इन तीनों में से किसका वर्चस्व है. नरसिंह राव और मनमोहन सिंह की जोड़ी ने जो नयी आर्थिक नीतियाँ लागू की थीं उसका मूल दर्शन यह है कि अर्थवयवस्था में राज्य की भूमिका सिकुड़ती जाए और इसे पूँजी व इसे नियंत्रित करने वाले सरमायेदारों के भरोसे छोड़ दिया जाए. इस वयवस्था के दो सबसे अहम मंत्र है निवेशऔर सुधार”. 25 साल पहले तत्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि सुधारोंका यह सिलसिला एक ऐसी धारा है, जिसके प्रवाह को मोड़ा नहीं जा सकता आज लगभग सभी पार्टियाँ मनमोहन सिंह की इस बात को ही सही साबित करने में जुटी हुई हैं.

सामान्य तर्क कहता है कि वैश्वीकृत भारत में मजदूरों पर भी अंतर्राष्ट्रीय मानक लागू हों लेकिन उदारीकरणकारोबारी नियमों को आसान बनाने की मांग करता है इसलिए भारत सरकार को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुझाव दिए जाते हैं कि उसे देश को कारोबार के लिहाज बेहतरबनाने के लिए उसे प्रशासनिक, नियामिक और श्रम सुधार करने होंगें और इस दिशा में आने वाली सभी अड़चनों को दूर करना होगा. नरसिंह राव से लेकर यूपीए-2 तक पिछली सभी सरकारें इसी के लिए प्रतिबद्ध रही है और सुधार व निवेश उनके एजेंडे पर रहा हैं. वे अर्थव्यवस्था के एक बड़े हिस्से को सावर्जनिक क्षेत्र में ले आये हैं,नियमों को ढीला बना दिया गया है, सेवा क्षेत्र का अनंत विस्तार हुआ है. लेकिन उदारीकरण के दुसरे चरण में इसके पैरोकार मनमोहन सिंह की खिचड़ी और थकी सरकार से निराश थे और उन्हें मनमोहन सिंह एक नए संस्करण की तलाश थी जो उन्हें उस समय के गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी में दिखाई पड़ रहा था. 2014 ने नरेंद्र मोदी को वह मौका दे दिया की वे इन उम्मीदों को पूरा कर सकें. अब जबकि उनकी स्पष्ट बहुमत की सरकार है तो राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय निगम और उनके पैरोकारयह उम्मीद कर रहे हैं कि मोदी सरकार उदारीकरण की प्रक्रिया में गति लाये और श्रम सुधारों की प्रक्रिया को आगे बढ़ाये. श्रम कानूनों में सुधार को लेकर उनका तर्क है कि मौजूदा श्रम कानून कंपनियों के खिलाफ हैं और नई नौकरियों में बाधक हैं इसलिए निवेश बढ़ाने वज्यादा नौकरियां पैदा करने के लिये लिए श्रम कानूनों को शिथिल करना जरूरी है. इसको लेकर मोदी सरकार भी बहुत उत्साहित दिखाई पड़ रही है तभी तो संभालने के दो महीने के भीतर ही केंद्रीय कैबिनेट ने श्रम क़ानूनों में 54 संशोधन प्रस्तावित कर दिए थे. हमारे देश में करीब 44 श्रम संबंधित कानून हैं सरकार इनको चार कानूनों में एकीकृत करना चाहती हैं. प्रस्तावित बदलाओं से न्यूनतम मेहनताना और कार्य समयावधि सीमा हट जायेगी , “हायरऔर फायरके नियम आसन हो जायेंगें श्रमिकों के लिए यूनियन बनाना और बंद या हड़ताल बुलाना मुश्किल हो जाएगा.

पिछले दो सालों में मोदी सरकार के श्रम कानून में सुधार के प्रयासों को श्रमिक संगठनों से कड़ा विरोध झेलना पड़ी है. ट्रेड यूनियनों का कहना है कि यह एकतरफा बदलाव है इनसे मालिकों को ज्यादा अधिकार मिल जायेंगें और उनके लिए कर्मचारियों की छंटनी करना और काम के घंटे बढ़ाना आसन हो जाएगा. एक तरफ ट्रेड यूनियन विरोध कर रहे हैं तो दूसरी तरह राज्य सभा में सरकार को बहुमत नहीं है, शायद इसीलिए सत्ताधारी पार्टी ने एक दूसरा रास्ता निकला है और राजस्थान,गुजरात, मध्यप्रदेश महाराष्ट्र जैसे भाजपा शासित राज्यों में में इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया है. राजस्थान तो जैसे इन तथाकथित सुधारों की प्रयोगशाला के तौर पर उभरा है राजस्थान विधानसभा ने जो औद्योगिक विवाद (राजस्थान संशोधन) विधेयक 2014, ठेका श्रम (विनियमन और उत्पादन) राजस्थान संशोधन विधेयक, कारखाना (राजस्थान संशोधन) विधेयक और प्रशिक्षु अधिनियम पारित किया है जिसके बाद अब कंपनियाँ मजदूरों को नौकरी से निकालने के मामले में और भी बेलगाम हो जायेगीं,100 के जगह पर अब 300 कर्मचारियों तक के कारखानो को बंद करने के लिए सरकार से अनुमति की बाध्यता रह गई है, इसी तरह से ठेका मज़दूर कानून भी अब मौजुदा 20 श्रमिकों के स्थान पर 50 कर्मचारियों पर लागू होगा इसका अर्थ यह है कि कोई कंपनी अगर 49 मजदूरों को ठेके पर रखती है तो उन मजदूरों के प्रति उसकी किसी प्रकार की जबावदेही नहीं होगी. पहले एक कारखाने में किसी यूनियन के रूप में मान्यता के लिए 15 प्रतिशत सदस्य संख्या जरूरी थी लेकिन इसे बढ़ाकर 30 प्रतिशत कर दिया गया है इसका अर्थ यह होगा कि मजदूरों के लिए अब यूनियन बनाकर मान्यता प्राप्त करना मुश्किल हो गया है इससे नियोजको को यह अवसर मिलेगा कि वे अपनी पंसदीदा यूनियनो को ही बढावा दे.

सितंबर, 2015 में राष्ट्रपति द्वारा गुजरात सरकार के श्रम कानून संशोधन अधिनियम 2015 को स्वीकृति कर दिया गया है, इस अधिनियम के कुछ उपबंध केंद्र सरकार के श्रम कानून अधिनियम के उपबंधों के विरुद्ध थे, इसी कारण इसे राष्ट्रपति की स्वीकृति की आवश्यकता पड़ी. अधिनियम में मजदूरों एवं मालिकों के बीच होने वाले विवादों को अदालतों से बाहर सुलझाने पर बल दिया गया है, इसी तरह से यदि श्रमिक श्रम आयुक्त को सूचना दिए बिना हड़ताल पर जाते हैं तो उनके ऊपर 150 रुपये प्रति दिन के हिसाब से समझौता शुल्क लगाया जा सकेगा जो अधिकतम 3000 तक है, यह सरकार को “जनपयोगी सेवाओं” में हड़ताल पर एक बार में 1 वर्ष तक प्रतिबंधित करने का अधिकार देता है. अधिनियम मालिकों को बिना पूर्व सूचना के श्रमिकों के कार्य में परिवर्तन का अधिकार भी देता है.

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जुलाई 2015 को मध्यप्रदेश विधानसभा ने 15 केन्द्रीय श्रम कानून के प्रावधानों को उदारएवं सरलबनाते हुए मध्यप्रदेश श्रम कानून (संशोधन) एवं विविध प्रावधान विधेयक-2015” पारित किया है जिसे राष्ट्रपति की सहमति के लिए केन्द्र भेजा गया है. महाराष्ट्र में भी इसी तरह केसुधारकी तैयारी की जा रही है महाराष्ट्र के श्रम विभाग ने वही संशोधन प्रस्तावित किये हैं जो राजस्थान सरकार ने लागु किये हैं इन बदलावों से राज्य की 95 % औद्योगिक इकाइयों को सरकार की मंजूरी के बगैर अपने कर्मचारियों की छटनी करने या इकाई को बंद करने की छूट मिल जायेगी.

इन तथाकथित सुधारोंसे लम्बे संघर्षों के बाद मजदूरों को सीमित अधिकारों को भी खत्म किया जा रहा है,यह इरादतन किया जा रहा है ताकि नियोक्ताओं व कॉरपोरेट घरानों को फायदा पहुचाया जा सके. हालांकि इसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि इससे रोजगार में वृद्धि होगी जिसकामतलब यह है अब सरकार के लिए रोजगार का मतलब सम्मानजनक जीवन जीने लायक रोजगार से नहीं रह गया है.

हमारे देश में कामगारों का अधिकतर हिस्सा असंगठित क्षेत्र में आता है, राष्ट्रीय नमूना सर्वे संगठन (एनएसएसओ) के अनुसार वर्ष 2009-10 में भारत में कुल 46.5 करोड़ कामगार थे इसमें मात्र 2.8 करोड़ (छह प्रतिशत) ही संगठित क्षेत्र में कार्यरत थे बाकी 43.7 करोड़ यानी 97.2 प्रतिशत असंगठित क्षेत्र में कार्यरत थे. असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे अधिकतर कामगारों की स्थिति खराब है वे न्यूनतम मजदूरी और सुविधाओं के साथ काम कर रहे हैं और सामाजिक सुरक्षा के लाभ से महरूम हैं. एनएसएसओ के 68वें चरण के सर्वेक्षण के अनुसार वर्ष 2011-12 में भारत में करीब 68 फीसदी कामगारों के पास न तो लिखित नौकरी का अनुबंध था और न ही उन्हें सवेतन अवकाश दिया जाता था, इसी तरह से ज्यादातर असंगठित श्रमिक ट्रेड यूनियन के दायरे से बाहर हैं उपरोक्त रिपोर्ट के अनुसार 87 फीसदी कामगार किसी संगठन या यूनियन से नहीं जुड़े थे.

भूमंडलीकरण के इस दौर में पूँजी अपने निवेश के लिए ऐसे स्थानों के तलाश में रहती है जहाँ श्रम और अन्य सुविधायें सस्ती हों. हमारे देश में लोग इतने मजबूर है कि वे कम मजदूरी और गैर-मानवीय हालातों में काम करने को तैयार हैं. इसलिए भारत को असीमित  मुनाफा कमाने के लिए एक आदर्श देश के रूप में प्रचारित किया जा रहा है. श्रम सुधारों के लिए 2016 और इसके बाद मोदी सरकार के बचे दो साल बहुत अहम होने जा रहे हैं. मेक इन इंडियाअभियान की शुरुआत जोर शोर से हो चुकी है और मोदी इसे लेकर दुनिया के एक बड़े हिस्से को नाप चुके हैं स्वाभाविक रूप से उनका अगला कदम श्रम सुधारों की गति को तेज करना होगा. आजादी के बाद यह सबसे बड़ा श्रम सुधार होने जा रहा है. इसको लेकर हर स्तर पर तैयारियाँ हो रही है, किसी भी तरह से राज्य सभा में बहुत हासिल करना उसी तैयारी का एक हिस्सा है ताकि इन  बदलाओं को वहां आसानी से पारित कराया जा सके.


निश्चित रूप से उदारीकरण का यह दौर मजदूरों के लिए अनुदार है और उनके लिए परिस्थितियां बद से बदतर होती जा रही हैं.

Friday, May 6, 2016

[NSI Public Meeting] Nation, Class And Global Capitalism


Dear Comrades,

Greetings! It is 2016, the centenary year of Lenin’s booklet on Imperialism and next year,2017 it will be the centenary of October Revolution. Imperialism was there then and it is here even today. The world is a very different place from what it was a century ago. Conditions of imperialist colonialism and indigenous feudalisms under which revolutionary left became a global force seem to have receded from the world stage and capitalism reigns supreme in every nook and corner of a postcolonial world. How should one trace the trajectory of the concept of imperialism through the century after Lenin? In what ways the concept remains relevant even today and in what ways has it changed? How should one review the actual flow of world history through these years? What lessons to learn and what expectations to nurse when it comes to revolutions against capitalism – confronting it directly and under the conditions of bourgeois democracy – perhaps for the first time in entire history? What is the state of global economy and politics and on the modus operandi of imperialism today?

To mark this historic centenary of a pamphlet we, of New Socialist Initiative, are organizing a talk mentioned below. We are pleased to invite you to participate in the programme. We would be very delighted if you came and participated in the discussions.

Lal Salaam,

Subhash Gatade (NSI Convenor)
Bonojit Hussain (NSI Delhi State Convenor)


Thursday, April 14, 2016

Bhim Yatra .. so that there are no more killings

- Subhash Gatade

Rarely does Jantar-Mantar, the place in the heart of Delhi, gets ‘enlivened’ with people who share very similar type of tragedy - one should say man made tragedy. The culmination of 125 day Bhim Yatra - led by Safai Karmchari Aandolan - which had started from Dibrugarh in the North East on 10 th December and had traversed around 500 districts and 30 states, proved to be one such occasion. (13 th April 2016)
The big public meeting organised at Jantar Mantar, attended by hundreds of safai karmcharis from different parts of the country and many individuals, activists who are sympathetic to their cause, was just another way to celebrate Dr Ambedkar’s 125 th birth anniversary, a day earlier. Special focus of the Yatra was on deaths in sewers and septic tanks and the key slogan was ‘Stop Killing us in Dry Latrines, Sewers and Septic tanks’. In fact, most of the people who were sitting on the podium belonged to such families only, who had lost their near-dear ones in cleaning sewer or septic tanks
Sunayana ( age 9 years) who lives with her grandparents these days in Lucknow, had lost her father in similar ‘accident’ and her mother also died due to shock within few days of her father’s death. There was Rahul ( aged 13 years) from Tamil Nadu who had lost his father merely a week back and was inconsolable on stage also. Pinki ( aged 35 year) from Varanasi, a mother of two kids was one of the most articulate among those who had gathered there. She had lost her husband three years back and was emphatic that ‘we are not here for compensation.’ We are part of this caravan now and ‘want that nobody should face similar tragedies hereafter.’ Kartar ( Delhi) still could recount how his son was called by his contractor when a fellow worker had already died cleaning the sewer. According to him the contractor rather forced him to descend into the sewer and take out fellow workers body and in the process his son also inhaled poisonous gases and died on the spot.
Everybody had a heartrending story to tell. Many like Santosh just could not even utter a word as it was no narrating an experience but ‘reliving’ the whole episode and its aftermath.
A query rather resonated all these presentations: How long their sons/husbands will have to die cleaning other people’s waste and excreta in a country which boasts of sending satellites into space. How does one explain allotment of thousands of crores of Rs for drainage and sewerage work, so much money being spent on laying/relaying pipes and drains that are designed to kill? Is it because ours is a society where Varna mind-set still dominates, and that’s why a human friendly system of garbage and sewage management has still not been conceived as planners rely on ‘expendable dalit labour’.

Monday, April 4, 2016

एक गैर-आधुनिक समाज में फांसीवाद :- प्रतिरोध की संभावनाये एवं सीमायें


-स्वदेश कुमार सिन्हा

“आधुनिकता में तर्क बुद्धि और व्यक्ति का अधिकार निहित होता है”

                                  (रवि सिन्हा ,एक्टिविस्ट ,समाज वैज्ञानिक)


आज हम एक ऐसे देश में रह रहे हैं जिसमें नई व्यवस्था के ठग और गिरोहबाज जब अवैद्य वध की बात करते हैं तो उनका मतलब कत्ल कर दिये गये जीते जागते इन्सान से नही , मारी गयी एक काल्पनिक गाय से होता है। जब घटनास्थल से फोरेंसिक जांच के लिए सबूतउठाने की बात करते हैं  तो उनका मतलब मार डाले गये आदमी की लाश से नही फ्रीज में मौजूद भोजन से होता है। हम कहते हैं  कि हमने प्रगतिकी है लेकिन जब दलितो की हत्या होती है और उनके बच्चो केा जिन्दा जला दिया जाता है तेा हमला झेले , मारे जाने ,गोली खाये या जेल जाये बिना आज कौन सा लेखक बाबा साहब अम्बेडकर की तरह खुल कर कह सकता है कि ’’अछूतो के लिए हिन्दुत्व संत्रासों की एक वास्तविक कोठरी है ? कौन लेखक वह सब कुछ लिख सकता है जेा सआदत हसन मंटो ने अंकल सैम के लिए पत्रमें लिखा ? इस बात से फर्क कही पड़ता कि हम कही जा रही बात से सहमत हैं या असहमत। यदि हमें  स्वतंत्र अभिव्यक्ति का अधिकार नही होगा तो हम बौद्धिक कुपोषण से पीडि़त मूर्खो के एक देश में बदल कर रह जायेंगे। पूरे उपमहाद्वीप में पतन की एक दौड़ चल रही है। जिसमें नया भारत भी जोश खरोश से शामिल हो गया है। यहाँ भी सेंसरशिप भीड़ को आउटसोर्स कर दी गयी है।
                                           -अरूंधति राय

इस लम्बे लेख के कुछ अंश ही आज के भारत के वास्तविक चित्र को सामने रख देते हैं । 1919 में गुरूदेव रविन्द्र नाथ ठाकुरने अंग्रेज सरकार से मिली नाइटकी पदवी लौटा दी थी जलियाँ वाला बागनरसंहार के लिए जिम्मेदार सरकारी नीतियों की मुखालिफत करने का यह उनका तरीका था। उन्होने एक लेख में लिखा थायह एक ऐसा समय है ,जब सम्मान के बिल्ले हमारे चतुर्दिक अपमान को और अधिक नुमाया करने लगे हैं ।  तब दौर उपनिवेशवाद का था आज हम एक स्वतंत्र सम्प्रभुता सम्पन्न लोकतांत्रिक देश हैं तथा संघ परिवार का फांसीवाद ,चुनाव लड़कर भारी समर्थन से सत्ता मेंआया है, तथा इससे कुछ भी फर्क नही पड़ता है कि उसके वोटो का प्रतिशत कितना है। संभवतः भारतीय इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि ’’संघ परिवार के फांसीवादी कदमो के विरोध में बड़े पैमाने पर साहित्यकारो , लेखको ,इतिहासकारो वैज्ञानिको तथा अकादमिकशियनों द्वारा प्रतिरोध के फलस्वरूप ’’साहित्य अकादमीतथा अन्य प्रकार के राजकीय पुरस्कारो तथा सम्मानो के वापसी  की घटना घटित हुयी है। पुरस्कारो की वापसी की यह परिघटना बहुत दिन तक नही चल सकती थी , और ऐसा ही हुआ। परन्तु संघ परिवार का फांसीवाद आज दूसरे दौर में पहुँच  गया है। 

हैदराबाद विश्वविद्यालय में दलित शोध छात्र ’’रोहित बेमुलाकी आत्महत्या जो एक तरह से संस्थानिक हत्या ही थी तथा जे.एन.यू. नयी छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैयासहित अनेक छात्र नेताओ की कथित राष्ट्र विरोधी नारो के नाम पर लम्बे समय तक की गिरफ्तारी का यह दौर पिछले समय से भी ज्यादा खतरनाक है। कथित अंधराष्ट्रवाद की जो बहस फांसीवादियों द्वारा चलायी जा रही है वह हमें उस दौर की याद दिलाती है जब नस्ल ,जाति तथा कथित जर्मन अन्धराष्ट्रवाद के नाम पर लाखो यहूदियों को गैस चैम्बरो में जला कर मार डाला गया था। जर्मनी , इटली ,स्पेन में फाॅसीवाद तथा नाजीवाद को इतना ब्यापक जन समर्थन हासिल नही था , क्योकि वे अपेक्षाकृत आधुनिक समाज थे। द्वितीय महायुद्ध की पराजय ने वहां पर फाॅसीवाद तथा नाजीवाद की कमर तोड़ दी थी। परन्तु हमारे देश में  स्थिति भिन्न है यहाँ के पिछड़े तथा गैर आधुनिक समाज में  जिसकी अधिरचना में अभी भी गहरे तक सामती मूल्य विद्यमान है। जनता की पिछड़ी मानसिकता का दोहन करके कोई भी फांसीवादी राज्य लम्बे समय तक टिका रह सकता है। वास्तव में आधुनिकता की यह समस्या भारत सहित तीसरी दुनिया के समाजो में इसके पूर्व ढाँचे  में ही निहित है। इसके बीजो की तलाश हमें अंगेजो के आने से पहले की भारतीय ग्राम संरचना में करनी होगी।

19वीं सदी में भारतीय समाज की आर्थिक सामाजिक संरचना

छोट-छोटे गावं में  बसा भारत ब्रिटिशो के आने से पूर्व कई अर्थो में आबाद था। आक्रमणकारी आये ,गये ,लड़ाइयां होती रही तख्त और ताज बदलते रहे लेकिन गावं नही बदले। वे अपने अर्थतंत्र में आत्मनिर्भर थे। जरूरतो की लगभग सारी चीजे खुद ही पैदा कर लेते और मेहनत मजदूरी में ब्यस्त रहते। गावं की सामाजिक व्यवस्था पर धर्म का जबरदस्त प्रभाव था। वे उसकी सीमा लांघ कर आगे बढ़ने की बात सोच भी नही सकते थे। सामन्तवादी ब्यवस्था के कारण राजा सर्वे सर्वा जरूर थे ,लेकिन गावं की भूमि पर उनका कोई अधिकार नही था। भूमिपर अधिकार गावं का होता था। राजा को उसका कर भार देने के बाद शेष सारी उपज गावं के ही काम में लायी जाती थी।

गावं में किसानेा के अतिरिक्त बढ़ई ,लोहार, कुम्हार, जुलाहा, मोची , धोबी , तेली, हज्जाम ,जैसे मजदूर किस्म के लोग भी रहते थे। लेकिन यह भी गावं की ही जरूरतो को पूरा करने के लिए खटते थे। ग्राम समुदाय में कर्मकारो का भी एक वर्ग होता था जो हलखोर का काम करते थे, जो अछूत समझे जाते थे। इनमें से अधिकांश देश की उन आदिम निवासियों के वंशज थे , जिनको समूल विनिष्ट करने के बदले ,प्राचीन काल में हिन्दू समाज ने आत्मसात कर लिया था। ’’(भारतीय राष्ट्रवाद की सामाजिक पृष्ठभूमि -ए0आर0 देसाई, पृष्ठ 7-8) लोगो के व्यवसाय जातियों के आधार पर तय होते थे। वे वंश परम्परागत निर्बाध रूप से चलते थे। व्यक्ति का कोई महत्व नही था। परिवार और जाति ही सब कुछ थे। बाहरी दुनिया से इन समुदायों का लेन-देन या विनिमय नाम मात्र का होता था। आवागमन के साधन बहुत ही कम थे।

Saturday, March 26, 2016

जे.एन.यू विवाद से निकला प्रतिरोध - संभावनायें और सीमायें

- जावेद अनीस

इस समय देश में जो कुछ भी हो रहा है उसे सामान्य नहीं कहा जा सकता है, राष्ट्रवाद बनाम देशद्रोह  पर बहस छिड़ी है और संघ के राष्ट्रवाद की परिभाषा को थोपने की कोशिश की जा रही है, एक तरह से इसके आधार पर विपरीत विचारधारा और आवाजों को देशद्रोही के तमगे से नवाजा जा रहा है. इसकी आंच ने सियासत और मीडिया के साथ समाज को भी अपने घेरे में ले लिया है. इतिहासकार रोमिला थापर इसे धार्मिक राष्ट्रवाद और सेक्युलर राष्ट्रवाद के बीच की लडाई मानती हैं. इस पूरे विवाद के केंद्र में देश के सबसे बेहतरीन विश्वविद्यालयों में से एक जेएनयू है जिसे एक अखाड़ा बना दिया गया है.

पूरे विवाद की शुरुआत बीते नौ फरवरी को हुई जब अतिवादी वाम संगठन डीएसयू के पूर्व सदस्यों द्वारा जेएनयू परिसर में अफजल गुरू की फांसी के विरोध में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया और कुछ टी.वी. चैनलों द्वारा दावा किया गया कि इसमें कथित रूप से भारत-विरोधी नारे लगाये गये हैं. बाद में जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया. कुछ दिनों बाद उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य की भी गिरफ्तारी हुई. कन्हैया को छह महीने की सशर्त अंतरिम ज़मानत मिल चुकी है.ज़मानत के बाद जिस तरह से कन्हैया कुमार ने अपना पक्ष रखते हुए लगातार संघ परिवार और मोदी सरकार को वैचारिक रूप से निशाना बनाया है उससे कन्हैया के शुभचिंतकों के साथ-साथ उनके विरोधी भी हैरान है और उनकी गिरफ्तारी को बड़ी भूल बता रहे हैं,  उनकी जोशीली और सटीक तकरीर इतनी असरदार दी थी कि टी.वी. चैनलों द्वारा इसका प्रसारण कई बार किया गया और उनकी बातों को देश के सभी हिस्सों में सुना-समझा गया. इधर लेफ्ट वालों को लग रहा है कि उन्हें एक नया सितारा बन गया है तो दूसरी तरफ संघ के लोग उन्हें चूहा भी कह रहे हैं.
इस पूरे प्रकरण में एआईएसएफ  के सदस्य कन्हैया कुमार की हड़बड़ी में की गयी गिरफ्तारी,कुछ चैनलों की भूमिका और वरिष्ठ केंद्रीय मंत्रियों की इस पूरे मसले में तत्परता ने कई सवाल खड़े किये हैं, कोई इसे लाल गढ़ कहे जाने वाले जेएनयू पर भगवा नियंत्रण की कवायद बता रहा है तो  कोई कह रहा है कि यह सब रोहित के मसले से ध्यान हटाने के लिए किया गया है, कुछ लोग इसे संघ परिवार  की नयी परियोजना बता रहे हैं जो संघ के राष्ट्रवाद के परिभाषा के आधार पर जनमत तैयार करने की उसकी लम्बी रणनीति का एक हिस्सा  है और  जिसका टकराव स्वंत्रता आन्दोलन से निकले “आधुनिक भारत की विचार से है. कुछ भी हो इन सबके बीच आज देश दो धड़ों में बंटा हुआ साफ़ नजर रहा है. यह एक वैचारिक लड़ाई है जो भारत को एक सेक्युलर और उग्र हिन्दू राष्ट्र के आधार पर देखने वालों के बीच है.