Monday, July 8, 2013

स्वतन्त्रता – या कॉपीराईट

- रिचर्ड स्टालमैन

कॉपीराईट की व्यवस्था प्रिेन्टिंग प्रैस के काल में लिखने व प्रकाशन के व्यवसाय पर औद्योगिक नियमन के रूप में स्थापित की गयी थी। इसका लक्ष्य भिन्न भिन्न स्रोतों से रचनाओं के प्रकाशन को प्रोत्साहन देना था, जिसके लिये प्रकाशकों को लेखकों की नवीन रचनाओं को छापने के लिये उनसे अनुमति की आवश्यकता का सहारा लिया गया। इससे रचनाकारों को प्रकाशकों के माध्यम से स्थायी आय मिली, और लेखन को प्रोत्साहन मिला। आम लोगों को भी इससे लाभ हुआ, जबकि नुक्सान लगभग नहीं के बराबर था। कॉपीराईट ने प्रकाशकों की ही सीमित किया, आम पाठकों को बाधित नहीं। एक बार किताब खरीद लेने के बाद वे किसी भी रूप में इसका इस्तेमाल कर सकते थे, अपने जानकारों से इसे साझा कर सकते थे, पूरानी किताबों की दुकान में इसे बेच सकते थे। इस प्रकार तर्क दिया जा सकता है कि कॉपीराईट से सर्वजन को लाभ हुआ, तथा इस प्रकार पिन्टिंग प्रेस के समय में इसको  वैधता प्राप्त थी। सब कुछ सही था (उस समय में)

अब हमारे पास सूचना के वितरण का नया ढंग है: कम्पयूटर तथा नेटवर्क । इनके ज़रिये किसी भी प्रकार की सूचना, चाहे वह साफ्टवेयर, संगीत, पुस्तक या फिल्म हो, की प्रतिलिपी बनाना व उसमें मनचाहा परिवर्तन करना बेहद आसान हो गया है। ये पाठकों व श्रोताओं को सभी प्रकार के डाटा की असीमित सुलभता प्रदान करते हैं – यानि कि सूचना का यूटोपिया। 

लेकिन एक रोड़ा इन असीम संभावनाओं के रास्ते में था: कॉपीराईट। जिन पाठकों व श्रोताओं ने प्रतिलिपी बनाने की नयी क्षमताओं का उपयोग किया तथा इनको अन्य लोगों से साझा किया, वे तकनीकी रूप में कॉपीराईट का उल्लंघन कर रहे थे। वही कानून जो पहले प्रकाशकों पर लाभकारी औद्योगिक नियमन था, वही अब आम लोगों के हित में रूकावट था। 

ऐसा कानून जो सर्वसाधारण की उपयोगी गतिविधियों को रोकता हो, जनतन्त्र में उसमें देर सवेर ढील दी जाती है। लेकिन यह वहां नहीं होता जहां कारपरेशनों के पास राजनीतिक ताकत होती है। प्रकाशकों की लॉबी लोगों को अपने कम्यूटरों की क्षमताओं का उपयोग करने से रोकने के लिये अडी हूई थी, तथा कॉपीराईट का कानून उसके लिये एक तैयार हथियार था। उनके प्रभाव के अन्तर्गत सरकारों ने कॉपीराईट के नियमों को नयी परिस्थितियों के अनुरूप आसान बनाने की बजाये और अधिक सख्त कर दिया तथा सूचना को साझा करने पर कड़े दन्ड देने लगीं। नागरिकों के खिलाफ प्रकाशकों के हित साधने का नवीनतम फैशन सूचना साझा करने वाले लोगों के इन्टरनेट कनेक्शन काट देना है, जिसे ’तीन आघात’ कहा जाता है। 


लेकिन सबसे  खराब बात यह नहीं थी। सॉफ्टवेयर बेचने वालों के हाथों में कम्पयूटर प्रभुत्व स्थापित करने का एक ताकतवर औजार हो सकता है अगर वे लोगों द्वारा सॉफ्टवेयर के उपयोग पर नियन्त्रण स्थापित कर लें। प्रकाशकों ने इस नियन्त्रण को एन्क्रिपिटड र्फोमेट(encrypted format) के माध्यम से प्राप्त किया जिन्हें विशेष आधिकारिक साफ्टवेयर की सहायता से ही देखा जा सकता है। इसकी मदद से उन्हें अभूतपूर्व अधिकार मिलते हैं, वे पाठकों को पैसे देने के लिये व अपनी पहचान बताने के लिये मजबूर कर सकते हैं, जब भी वे कोई पुस्तक पढते हैं, गाना सुनते हैं, या विडियो देखते हैं। प्रकाशकों का यही सपना है : हर बार देखने पर भुगतान करो (pay per view) का संसार।

प्रकाशकों की इच्छा को पूरा करने का साधन बना अमरीकी सरकार का सन 1998 का डिजीटल मिलेनियम कॉपीराईट एक्ट। इस कानून ने प्रकाशकों को स्वयं अपने कॉपीराईट नियम लिखने का अधिकार दिया जिन्हें वे अपने आधिकारिक साफ्टवेयर के कोड में शामिल कर सकते थे। इस प्रक्रिया को जिसे डिजीटल रिस्ट्रीक्शन मैनेजमेन्ट - यानि DRM कहा जाता है-  के  प्रकाशक की अनुमति के बिना पढ़ना व सुनना भी जुर्म है। 

हमारे पास प्रिन्ट पुस्तकों व एनालाग मीडिया के सम्बन्ध में पुरानी स्वतन्त्रता हैं। लेकिन अगर ई  – किताबों ने प्रिन्ट किताबों का स्थान ले लिया तो हम ये स्वतन्त्रताएं खो देंगे। कल्पना कीजिये : पुरानी किताबों की दुकानें नहीं रहेंगी, आप अपने मित्र को पढ़ने के लिये किताब नहीं दे पाएगे, आप पब्लिक लायब्रेरी से पूस्तकें उधार नहीं ले पाएगे – एसे किसी भी ’रिसाव’ की संभावना नहीं रहेगी जिसके जरिये कोई भी पैसे दिये बिना किताबें पढ़ सकेगा/गी। नाम बतलाये बिना नकद में पुस्तकें खरीदना संभव नहीं होगा क्योंकि ई पुस्तकों को क्रेडिट कार्ड पर ही खरीदा जा सकता है। यह है वो दुनिया जो प्रकाशक हम पर थोपना चाहते हैं। यदि आप अमेजोन का किन्डल  (हम उसे स्विन्डल. यानि धोखाधड़ी कहते हैं) या सोनी का रीडर (हम उसे श्रैडर कहते है, किताबों को इससे खतरे के मद्देनज़र) खरीदते हैं तो आप एसी दुनिया स्थापित करने में आर्थिक योगदान दे रहे हैं। 

स्विन्डल में पिछले दरवाजे से किताबों को दूर से मिटाने की ओरवेलियन दुनिया सी क्षमता है । अमेजोन ने इस क्षमता को ओरवेल की पुस्तक 1984 की खरीदी गयी प्रतियों पर दर्शाया है। लगता है अमेजोन के इस उत्पाद का नाम हमारी पुस्तकों को जला देने की मंशा को ही प्रतिबिंबित करता है।

डी आर एम के विरोध में आम लोगों का गुस्सा धीरे धीरे बढ़ रहा है, जो अभी तक दबा रहा है क्योंकि ’लेखकों का संरक्षंण’, ’बौद्धिक सम्पदा’ आदि प्रोपेगन्डा के मुहावरों ने लोगों को भ्रमित  कर रखा है कि उनके अपने अधिकार गौण हैं। इन शब्दों में यह मान्यता अंतर्निहित है कि लेखकों के नाम पर प्रकाशक विशेष अधिकारों के हकदार हैं, उनकी मांगों को मानना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है, तथा हमने किसी के साथ बुरा किया है अगर हम पैसे दिये बिना अनुमति के कोई भी रचना सुनते या देखते हैं।

जिन स्ंसथाओं को कॉपीराईट से कानूनन सबसे अधिक मुनाफा होता है वे इसे रचनाकारों के नाम से प्रयोग करती हैं, जबकि अधिकतर रचनाकारों को इससे बहुत कम लाभ होता है। वे हमें विश्वास दिलाना चाहते हैं कि कॉपीराईट रचनाकारों का प्राकृतिक अधिकार है, तथा हम आम लोगों को इसे स्वीकार करना ही चाहिये, बेशक इससे हमें कितना कष्ट हो। वे साझा करने को पाइरेसी(piracy) ,यानि समुद्री डकैती कहते हैं, जैसे पड़ोसी की मदद करना जहाज पर हमला करने जैसा हो। 

वे हमें बताते हैं कि सॉफ्टवेयर व मीडिया को साझा करने की प्रवर्ति पर हमला करके ही कला को जीवित रखा जा सकता है। अगर यह सही होता तब भी इससे प्रकाशकों की नीति न्यायोचित नहीं ठहरती, वैसे यह सही है भी नहीं। कापी की गयी रचनाओं को आम लोगों में साझा करने से अधिकतर रचनाओं की बिक्री बढ़ने की संभावना अधिक होती है,  सिवाये बेस्ट सेलर रचनाओं के। 

बेस्ट सेलर भी साझा करने पर रोक लगाये बिना काफी अच्छी बिक्री पा सकते हैं। स्टीफन किन्ग ने अपनी अरक्षित ई–पुस्तक धारावाहिक से लाखों डालर कमाये जिसको कॉपी करने व साझा करने की छूट थी। (वह इस प्रयोग से असन्तुष्ट था तथा उसने इसे असफल कहा है), लेकिन मुझे तो यह बहुत सफल प्रयास लगता है। रेडियोहेड ने 2007 में अपने प्रशंसकों को जितना वो चाहें उतने पैसे देकर उनकी एलबम कॉपी करने के लिये आमन्त्रित किया,  तथा इससे उन्होंने दसियों लाख डालर कमाये। सन 2008 में Nine Inch Nails ने प्रतिलिपियां साझा करने की अनुमति के साथ अपनी एल्बम निकाली तथा कुछ ही दिनों में उन्होंने सात लाख डालर कमाये। 

उत्पीड़न के बिना सफलता की संभावना बेस्ट सेलर रचनाओं तक ही सीमित नहीं है। प्रसिद्धि के विभिन्न स्तरों के रचनाकार अब अपने पाठकों व श्रोताओं की स्वैच्छिक अर्थिक मदद से पर्याप्त स्तर का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। केविन कैली के अनुसार एक कलाकार को लगभग 1000 सच्चे प्रशंसकों की आवश्यकता होती है। जब कम्पयूटर नेटवर्कों द्वारा बिना क्रेडिट कार्ड के छोटी मात्रा में किसी को पैसा भेजना संभव हो जायेगा तब कला को सहायता करने की कहीं अधिक अच्छी प्रणाली स्थापित होगी। जब आप कोई रचना देखेंगे तो एक बटन होगा जिस पर लिखा होगा कलाकार को एक डालर भेजने के लिये दबायें, तो तब क्या आप सप्ताह में कम से कम एक बार बटन नहीं दबाएगे। 

कला व संगीत को सहायता करने का एक अन्य अच्छा तरीका टैक्स कोष हैं जिन्हें संभवतः खाली सीडी, ड्राईवों व इन्टरनेट कनेक्शन पर टैक्स लगाकर स्थापित किया जा सकता है। राज्य को यह टैक्स सारा का सारा कलाकारों में बांट देना चाहिये, बजाये कारपोरेट अधिकारयों पर बेकार करने के। लेकिन राज्य को इसे लोकप्रियता के अनुपात में नहीं बांटना चाहिये, क्योंकि इससे कुछ सुपरस्टार कलाकारों को ही अधिकतर पैसा मिलेगा, जबकि बाकी सभी अन्य कलाकारों को थोड़ी सी ही सहायता मिलेगी। इसलिये मैं घनमूल या इस जैसे फलनों की वकालत करता हूं। एकघाती अनुपात के अनुसार अगर कलाकार क की लोकप्रियता एक दूसरे सफल कलाकार ख से 1000 गुना अधिक है तो क को ख के मुकाबले 1000 गुना अधिक राशि मिलेगी। जबकि घनमूल फलन के अनुसार यह राशि 10 गुना अधिक होगी। इस प्रकार सुपरस्टार कलाकार कम लोकप्रिय कलाकार से अधिक राशि तो पायेंगे, लेकिन अधिकतर पैसा उन कलाकारों को जायेगा जिन्हें इनकी अधिक आवश्यकता होती है। एसी व्यवस्था कला की सहायता के लिये हमारे टैक्स धन का अधिक सफलतापूर्वक उपयोग करेगी। 

ग्लोबल पेट्रोनेज प्रस्ताव इन दोनों व्यवस्थाओं के पक्षों को अपनाता है जिसमें अनिवार्य भुगतान के अलावा स्वैच्छिक अंशदान का प्रावधान है। स्पेन में ऐसी कर व्यवस्था से sage publication को विस्थापित किया जाना चाहिये (जो वहां पर रचनाकारों, लेखकों, तथा प्रकाशकों की प्रमुख सहकारी संस्था है), तथा इसे समाप्त कर देना चाहिये। कॉपीराइट का नेटवर्क युग से मेल बिठाने के लिये गैर व्यवसायिक कॉपी व साझा करने को वैध बना देना चाहिये तथा DRM पर रोक लगा देनी चाहिये। लेकिन जब तक हम यह लड़ाई नहीं जीत पाते हमें अपनी सुरक्षा स्वयं करनी है: DRM के उत्पादों को न खरीदें अगर आपके पास इसे निरस्त्र करने के साधन नहीं हैं। एक एसे उत्पाद को न खरीदें जिसे आपकी स्वतन्त्रता पर हमला करने के लिये बनाया गया है, जब तक आप इस हमले को निरस्त्र नहीं कर सकते  हैं। 

(रिचर्ड स्टालमैन को बहुधा एसे सबसे प्रभावशाली व्यक्ति के रूप में माना जाता है जिसके बारे में आम लोग नहीं जानते हैं। स्टालमैन कम्यूटर प्रोगामर हैं तथा सोफ्टवेयर को स्वतन्त्र रखने के लिये तीन दशकों से संघर्षरत रहे हैं। सितम्बर 1983 में उन्होंने GNU प्रोजेएक्ट शुरू किया जिसका लक्ष्य Unix की तरह का ऑपरेटिंग सिस्टम बनाना था जो सर्वसुलभ हो। इस प्रोजेक्ट से उन्होंने स्वतन्त्र साफ्टवेयर (Free Software) आन्दोलन की नींव डाली। स्टालमैन कॉपीलेफ्ट (Copyleft) प्रत्यय के जनक हैं तथा वे कई कॉपीलेफ्ट लाईसेन्सों को लेखक हैं जिनमें GNU General Public License भी शामिल है, जो सर्वसुलभ साफ्टवेयरों के लिये सबसे अधिक प्रयोग में लाये जाने वाला लाईसेंस है) ।     

1 comments:

Yashwant Mathur said...

कल 15/08/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद!

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